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पेरेंटिंग के बारे में क्या जानते हैं आप? जानिए अपने बच्चों की परवरिश का सही तरीका

पेरेंटिंग के बारे में क्या जानते हैं आप? जानिए अपने बच्चों की परवरिश का सही तरीका

पेरेंटिंग (Parenting) का अर्थ है बच्चों का पालन-पोषण और परवरिश करना। इसे दुनिया के सबसे मुश्किल कामों में से एक माना जाता है। माता-पिता के व्यवहार का बच्चों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और सभी पेरेंट्स का बच्चों की परवरिश करने का तरीका भी अलग होता है। हालांकि, अधिकतर माता-पिता को सही पेरेंटिंग (Parenting) के बारे में पता नहीं होता। हम अक्सर अपने बच्चे को भी वैसे ही पालने की कोशिश करते हैं, जैसे हमारे माता-पिता ने हमारा पालन-पोषण किया होता है। समय के साथ-साथ स्थितियों में भी परिवर्तन आया है। ऐसे में, आपको पेरेंटिंग के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। जानिए, किस तरह से करनी चाहिए बच्चों की परवरिश और पेरेंटिंग (Parenting) में किन बातों का ख्याल रखना जरूरी है।

पेरेंटिंग की शुरुआत (Beginning of parenting) कहां से होती है और इसका शुरूआती चरण कौन सा माना जाता है?

आमतौर पर सभी लोग यह मानते हैं कि पेरेंटहुड बच्चे के जन्म के बाद शुरू होता है। लेकिन, असल में पेरेंटिंग (Parenting) तभी से शुरू हो जाती है, जब बच्चा मां के गर्भ में होता है। गर्भ में ही बच्चे और माता-पिता का बॉन्ड बनना और शिशु के शरीर व दिमाग का निर्माण हो जाता है। यही नहीं, शिशु अपने माता-पिता की बातों को सुनना और महसूस करना भी शुरू कर देता है। इसके साथ ही आपने गर्भ ज्ञान के बारे में भी सुना ही होगा। यानी एक मां गर्भ में पल रहे शिशु को इस समय जो सीखाती है, शिशु उसे पूरी तरह से समझता है और उससे सीखता है। यह तो थी गर्भ ज्ञान की बात, अब जानिए कैसे होती है पेरेंटिंग की शुरुआत (Beginning of parenting):

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शिशु का शारीरिक विकास (Baby’s physical development)

गर्भ में ही शिशु के भौतिक जीवन की नीव रख दी जाती है। इस दौरान माता-पिता बच्चे को तत्काल भौतिक वातावरण प्रदान करते हैं, जिससे शिशु का शारीरिक विकास होता है। शिशु के अधिकतर अंग गर्भ में ही बन जानते हैं। इसके माता-पिता को कई चीजों का ध्यान रखना पड़ता है जैसे मां का सही आहार खाना, डॉक्टर की सलाह का पालन करना, समय-समय पर सभी टेस्ट कराना और शिशु को हर समस्या से बचाना आदि।

 Parenting

भावनात्मक नींव बनाना (Build an emotional foundation)

गर्भ में जीवन के बारे में सबसे बड़ा आश्चर्य इमोशनल इन्वोल्वमेंट और एक्सप्रेशन (Emotional Involvement and expression) है, जो आमतौर पर मनोविज्ञान या चिकित्सा में अपेक्षित नहीं है। ऐसा माना जाता है कि गर्भ में 15 सप्ताह के बाद बच्चा मां की हंसी या खांसी पर अपनी प्रतिक्रिया देता है।

माता पिता के साथ बेहतरीन संबंध स्थापित करना (Bond with Parents)

गर्भ में ही शिशु अपने माता-पिता के साथ अच्छा संबंध बना लेता है। इस दौरान न केवल वो अपनी मां बल्कि पिता के टच और उनकी आवाज को भी पहचानने लगता है।

बच्चे की उम्र के अनुसार पेरेंटिंग (Parenting) में किन बातों का ख्याल रखना चाहिए?

बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, वैसे ही बढ़ती हैं पेरेंट्स की मुश्किलें। खासतौर, पर वो माता-पिता जो संयुक्त परिवार में नहीं रहते। आजकल अधिकतर पेरेंट्स नौकरी करते हैं। ऐसे में बच्चों के लिए किसी के पास अधिक समय नहीं होता। उससे भी ज्यादा चिंता है इंटरनेट, मोबाइल और अन्य तकनीकों की। बच्चे आजकल केवल इन्हीं में व्यस्त रहते हैं। लेकिन, कुछ बातों का ध्यान रख कर आप पेरेंटिंग (Parenting) की समस्याओं को कम कर सकते हैं। जानिए बच्चे की उम्र के अनुसार पेरेंटिंग (Parenting) में किन बातों का ख्याल रखना चाहिए:

5 से 10 साल के बच्चे (Positive parenting of early aged child)

इस उम्र के बच्चों में एनर्जी कमाल की होती है और यह हमेशा कुछ न कुछ नया सीखने को तैयार रहते हैं। इस उम्र में आप जो आदतें उन्हें सीखा देंगे या जो भी बताएंगे, वो पूरी उम्र उनके साथ रहेगा। जानिए इस उम्र में किन बातों का आप रखें ध्यान:

  • अपने बच्चों को हायजीन का ख्याल रखने की शिक्षा अवश्य दें। खुद को अपने आसपास की स्थान को साफ रखने से वो स्वस्थ रहेंगे।
    इस उम्र के बच्चे में आहार संबंधी अच्छी आदतें भी डालें। बच्चे को संतुलित और सेहतमंद आहार का महत्व समझाएं।
  • रनिंग, फुटबाल या अन्य खेल खेलना और साइकिल चलना बच्चों को पसंद होता है। उनमें अधिक से अधिक शारीरिक गतिविधियों को अपने जीवन में शामिल करने को कहें, ताकि वो वर्चुअल चीजों से जितना अधिक हो सके, दूर रहें।
  • बच्चे को अपने काम खुद करने के लिए कहें जैसे अपना कमरा साफ करना, अपना होमवर्क खुद करना आदि।
  • इस उम्र के बच्चों को गुड-टच और बैड-टच के बारे में अवश्य बताएं, ताकि वो सुरक्षित रहें। इसके साथ ही उसे उसकी सुरक्षा को लेकर भी सतर्क करें।
  • बच्चे के लिए सोने का समय और उठने का समय निर्धारित कर लें। अगर इस उम्र में बच्चे जल्दी उठने और जल्दी सोने की आदत डालेंगे। तो न केवल अपना हर काम सही समय पर कर पाएंगे बल्कि पूरी उम्र उनकी यह आदत उनके साथ रहेगी।

पेरेंटिंग

10 से 16 साल के बच्चे (Positive parenting of middle aged child)

12 साल की उम्र के बाद बच्चे टीनएज में कदम रखते हैं। इस दौरान बच्चों के जीवन का नया चरण शुरू होता है। इस दौरान बच्चे काफी चीजों में इंडिपैंडेंट भी हो जाते हैं। यह उम्र उनके लिए कई मौके ले कर आएगी। लेकिन, फिर भी उन्हें आपके मार्गदर्शन और ध्यान की पूरी जरूरत हैं। इन चीजों का रखें ख्याल:

  • इस उम्र के बच्चों को अधिक कैलोरी और पोषक तत्वों की जरूरत होती है। ऐसे में बच्चों को हेल्दी आहार जैसे फल, सब्जियां आदि खाने को कहें।
  • उन्हें समझाएं कि यौन गतिविधि के परिणाम क्या हो सकते हैं। इसके साथ ही उन्हें धूम्रपान करने, शराब और ड्रग्स का सेवन जैसी चीजों के बारे में सचेत करें और दुष्प्रभावों के बारे में समझाएं। आपके बच्चे के दोस्त की तरह के हैं, इस पर भी ध्यान दें।
  • बच्चे को समझदारी से पैसे कमाने और खर्च करने के बारे में भी समझाएं और वो पैसे कैसे खर्च करते हैं इस बारे में भी ध्यान रखें।
  • आजकल युवाओं में अकेलापन, डिप्रेशन, सुसाइड जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में घर के माहौल को अच्छा और खुशनुमा बनाएं। इसके साथ ही बच्चों को समझने की कोशिश भी करें।

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16 से अधिक साल के बच्चे (Positive Parenting Tips for Teenagers)

16 के होने के बाद आपका बच्चा अब बच्चा नहीं है, बल्कि अब वो यौवन की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में, आपका उसके लिए अधिक चिंता करना स्वभाविक है। लेकिन अपने बच्चे पर विश्वास रखें और बातों का ध्यान रखें, जैसे:

  • अब आपका बच्चा युवावस्था (Youth) में कदम रखने वाला है या रख चुका है। इसलिए, अब बार-बार बच्चे को डांटना छोड़ दें।
  • उनके लिए एक अच्छे रोल मॉडल बने। अपनी बातों को केवल बोलें ही नहीं, बल्कि साबित कर के दिखाएं।
  • अन्य बच्चों से अपने बच्चों की तुलना न करें। ऐसा करने से आपके बच्चे के मन में, जिससे आप तुलना कर रहे हैं, उसके खिलाफ बुरी भावनाएं पैदा हो सकती हैं।
  • उसकी गलतियों को भूल कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें, क्योंकि गलतियों से ही उसे नई सीख मिलेगी।
  • युवावस्था (Youth) में बच्चे इंडिपैंडेंट महसूस करते हैं। ऐसे में, उसे आजादी दें लेकिन उस पर और उसकी दोस्तों पर नजर रखें
  • अनुशासन को लेकर सही और कंसिस्टेंट बने रहें। उसे जब कोई समस्या हो, तो पहला कदम उठाएं और उसकी समस्या को हल करने की कोशिश करें।

पेरेंटिंग में चाइल्ड सायकोलॉजी का क्या महत्व है और इसे कैसे समझा जा सकता है? (importance of child psychology)

पेरेंटिंग के दौरान छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। इस बारे में लखनऊ किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सक डॉक्टर देव आशीष का कहना है,” बच्चे एक कच्चे मिट्टी की तरह होते हैं। हम जैसा उनके सामने व्यवहार करते हैं या समझाते हैं, वो वैसा ही करने लगते हैं। इसलिए बच्चों की पेरेंटिंग बहुत सोच समझकर करनी चाहिए। अपनी बात मनवाने के लिए बच्चों पर गुस्सा करने जैसी गलती नहीं करनी चाहिए। पेरेंटिंग (Parenting) में जो सबसे जरूरी चीज है, वो है अपने बच्चे को समझना। जैसे-जैसे बच्चे बड़े और मेच्योर होते हैं, यह अपने बच्चे का मार्गदर्शन और परवरिश करने में बहुत सहायक है। आपको यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि आपके बच्चे में एक यूनिक व्यक्तित्व विशेषता है, जो जीवन भर उसके साथ रहेगी। चाइल्ड सायकोलॉजी (Child psychology) अवचेतन और सचेत चाइल्डहुड डेवलपमेंट का अध्ययन है। एक माता- पिता के रूप में अगर आप अपने बच्चे की चाइल्ड सायकोलॉजी समझना चाहते हैं, तो आपको उनके खाने , खेलने, सोने तक की हर चीज को नोटिस करना होगा और जानना होगा कि वो कौन सी चीज में रूचि लेता है।”

छोटे बच्चों के मामले में, उन्हें उनके विचारों और भावनाओं को समझने के लिए उनके हावभाव और बॉडी लैंग्वेज को नोटिस कर सकते हैं। उनसे सवाल पूछने पर भी वे अपनी भावनाओं को आपसे साझा कर सकेंगे। हर माता पिता यही चाहते हैं कि उनके बच्चे का हेल्दी विकास हो लेकिन यह हमेशा स्पष्ट नहीं होता है कि बच्चे के बिहेवियर डेवेलपमेंट में सामान्य अवस्था का लक्षण क्या है या असामान्यता का संकेत क्या है। एक बाल मनोवैज्ञानिक आपको यह अंतर समझने में मदद कर सकते हैं। बच्चे के सामान्य और असामान्य मनोवैज्ञानिक पैटर्न को समझने से माता-पिता को यह समझने में मदद मिल सकती है कि कैसे अपने बच्चे के साथ सही से बात करें और उससे आपकी अटैचमेंट कैसे बढ़े।

यह भी पढ़ें: इन 5 बातों को ध्यान में रखकर करें माता-पिता की देखभाल

पेरेंटिंग के दौरान कौन सी बातों का ख्याल रखा जाना चाहिए? (Things to Remember During Parenting)

पेरेंटिंग (Parenting) के दौरान आपका अपने बच्चे को लेकर सचेत होना, उनका मार्गदर्शन करने के साथ ही उनके साथ अटैचमेंट बढ़ाना भी जरूरी है। इस दौरान कुछ बातों का खास ध्यान रखें, जैसे:

  • बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाएं और उन्हें हमेशा अच्छा करने के लिए प्रेरित करते रहें।
  • गलती करने पर भी बच्चे को समझाएं और अच्छा करने के लिए उसका उत्साह बढ़ाएं।
  • अनुशासन को बनाएं रखें और बच्चे को भी उनका पालन करने के लिए कहें। लेकिन अपने अनुशासन की सीमाओं को भी निर्धारित करें।
  • अपने बच्चे के लिए हमेशा समय निकालें।
  • छोटे बच्चे अपने माता-पिता को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए, उनके लिए एक अच्छा रोल मॉडल बने।
  • अपने अनकंडीशनल प्यार को व्यक्त करना न भूलें। इससे बच्चे को अच्छा लगेगा और मनोबल बढ़ेगा।
  • पेरेंट्स के रूप में अपनी जरूरतों और लिमिटेशन को न भूले।

पेरेंटिंग

किन गलतियों को ना करें? (Most Common Parenting Mistakes)

पेरेंटिंग (Parenting) को आसान बनाने के लिए कुछ चीजों का ध्यान रखना जरूरी है। छोटी उम्र में तनाव भी सामान्य है, ऐसे में बच्चे को शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से मजबूत बनाना जरूरी है। लेकिन ,हम कई बार इस दौरान कुछ गलतियां भी कर देते हैं और हमें पता भी नहीं होता। इसके लिए पेरेंटिंग (Parenting) में इन गलतियों को करने में बचे:

  • बच्चों की फीलिंग्स को न समझना: बच्चे भी अपनी भावनाओं को अपने माता-पिता से व्यक्त करना चाहते हैं। लेकिन, हम अक्सर उसे छोटी बात कह कर टाल देते हैं। यह गलत है। बच्चे की भावनाओं को समझना आपके लिए जरूरी है।
  • असफलता के लिए तैयार न करना: हम हमेशा अपने बच्चे को सबसे आगे देखना चाहते हैं। सच तो यह है कि हम अपने बच्चे को सफलता के लिए तो तैयार करते हैं ,लेकिन असफलता के लिए नहीं। लेकिन, बच्चों को समझाना चाहिए कि सफलता के साथ-साथ असफलता भी जीवन का हिस्सा है। इससे भी उन्हें शिक्षा लेनी चाहिए
  • हमेशा उन्हें प्रोटेक्ट करना: हम अक्सर अपने बच्चे को हमेशा सुरक्षित रखना चाहते हैं जो किसी हद तक ठीक भी है। लेकिन बच्चों को सुरक्षा से बाहर खुद जीवन के लिए तैयार करना भी आपकी जिम्मेदारी है
  • खुद का ध्यान न रखना: जैसे हम बड़े होते हैं। हमारे लिए हेल्दी हैबिट को बनाएं रखना मुश्किल होता है। ऐसे में अगर आप खुद का ख्याल नहीं रखते हैं। तो आप अपने बच्चों का ख्याल भी नहीं रख पाएंगे। इसलिए अपना भी ध्यान रखें।

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पेरेंटिंग में कौन से चैलेंजेज आते हैं? इन चैलेंजेज को कैसे संभालना चाहिए? (Challenges in Parenting)

पेरेंटिंग (Parenting) खुद में बहुत बड़ी चुनौती है। अगर आप इसमें सफल हो जाते हो, तो आपको खुद को किसी विजेता से कम नहीं मानना चाहिए। यह जिम्मेदारी खुशियों के साथ-साथ कई चुनौतियों को भी ले कर आती हैं। जानिए इन चैलेंजेज के बारे में:

  • पेरेंटिंग (Parenting) की सबसे बड़ी चुनौती है बच्चों को बेसिक देखभाल प्रदान करना जैसे कपड़े, शिक्षा या आहार आदि। इसके साथ ही उनकी जरूरतों का भी ख्याल रखना भी जरूरी है।
  • बच्चों के दिमागी और भावनात्मक जरूरतों जैसे प्यार, सुरक्षा, खुशी का ध्यान रखना भी जरूरी है। इस बात का ध्यान रखें कि आपके बच्चे को यह सब मिले।
  • बच्चों को सोशल बनाने के लिए शिक्षित करना भी एक चुनौती है। दूसरों के साथ बातचीत करना उनके समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण है। उन्हें स्कूल और पड़ोस में दोस्त बनाने के लिए कहें।

Quiz: शिशु की देखभाल के जानने हैं टिप्स तो खेलें क्विज

  • यह दिखाना कि आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं और यह सुनिश्चित करना कि आपका बच्चा जानता है कि आप उससे प्यार करते हैं, अपने आप में एक चैलेंज है। यदि आपके एक से अधिक बच्चे हैं, तो हमेशा अपने प्यार में समानता दिखाएं।
  • बच्चों में अच्छे व्यवहार को प्रेरित करना। उन्हें उचित आचरण सीखना जरूरी है, लेकिन आपके लिए एक चुनौती है।
  • बच्चों की शैक्षिक आवश्यकताओं की देखभाल करना जरूरी है। उन्हें उचित अध्ययन की आदतें सिखाना उनके लिए अच्छा प्रदर्शन करना महत्वपूर्ण है।
  • अनुशासन के महत्व को बढ़ाते हुए अपने बच्चे को अनुशासन का महत्व सीखना जरूरी है। यह आपके लिए के चुनौती हो सकती है।
  • एक रोल मॉडल होने के नाते अपने बच्चे से सीखने के लिए आपका एक सकारात्मक और प्रेरक रोल मॉडल बनना सबसे चुनौती पूर्ण कामों में से एक है। क्योंकि, आपका बच्चा पहले रोल मॉडल के रूप में आपको देखता है।

पेरेंटिंग के दौरान आनेवाली समस्याओं से निपटने के लिए कौन सी थेरेपी मददगार साबित हो सकती है? (Therapies for parenting skills)

पेरेंटिंग (Parenting) आसान नहीं है। लेकिन, काउंसलर और थेरेपिस्ट की मदद से आप इसे आसान कर सकते हैं। पेरेंटिंग (Parenting) काउंसलिंग को पेरेंटिंग थेरेपी (Parenting Therapy) के नाम से भी जाना जाता है। यह थेरेपीज कई स्थितियों में आपके लिए लाभदायक साबित हो सकती हैं। चाहे यह स्थिति आपके और आपके बच्चे के बीच में कोई समस्या हो या बच्चे के विकास या स्वास्थ्य समस्या से जुड़ी कोई परेशानी हो। पेरेंटिंग काउंसलर (Parenting Counsellor) काउन्सलिंग सेशन के दौरान कई तकनीकों का प्रयोग करते हैं और यह तकनीक सिचुएशन पर निर्भर करती हैं। जैसे अगर यह स्थिति एंग्जायटी या डिप्रेशन से जुडी है तो डॉक्टर टॉक थेरेपी (Talk Therapy) की सलाह दे सकते हैं। ट्रॉमा या डिप्रेशन से जुड़ी परेशानियों के लिए कॉग्निटिव-बिहेवियर थेरेपी का प्रयोग किया जाता है।

पेरेंटिंग

कॉग्निटिव-बिहेवियरल थेरेपी (Cognitive-Behavioral Therapy) क्या है ?

कॉग्निटिव-बिहेवियरल थेरेपी (Cognitive-Behavioral Therapy) का उपयोग विभिन्न प्रकार के व्यक्तिगत और पेरेंटिंग (Parenting) मुद्दों के इलाज के लिए किया जाता है, जैसे:

  • डिप्रेशन (Depression)
  • एंग्जायटी (Anxiety)
  • फोबिया (Fobia)
  • सेक्शुअल डिसऑर्डर (Sexual Disorder)
  • ईटिंग डिसऑर्डर (Eating Disorder)
  • पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (Post-traumatic stress disorder)

कॉग्निटिव-बिहेवियरल थेरेपिस्ट्स (Cognitive-behavioral therapists) से हम क्या सीख सकते हैं ?

कॉग्निटिव-बिहेवियरल थेरेपिस्ट्स (Cognitive-behavioral therapists) हमें उन स्ट्रेटेजीज के बारे में सीखा सकते हैं, जो हमें चुनौतीपूर्ण पेरेंटिंग (Parenting) स्थितियों में काम आ सकते हैं। ये थेरेपी सीखाती हैं कि नकारात्मक और डिस्ट्रक्टिव थॉट पैटर्न को ठीक से कैसे पहचाना जाए, ताकि आप इनका उपचार किया जा सके। इससे यह भी जान सकते हैं कि आप अपने बच्चे का पालन-पोषण अच्छे से कर रहे हैं और आप बेहतरीन पेरेंट्स हैं ।

यह भी पढ़ें: किशोरावस्था में बदलाव के दौरान माता-पिता कैसे निभाएं अपनी जिम्मेदारी?

अगर आप पेरेंटिंग (Parenting) को मजेदार बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने बच्चों के साथ कम्युनिकेशन सही रखें और उन्हें समझने की कोशिश करें। इसके साथ ही बच्चे से अधिक अपेक्षा रखने से भी बचे क्योंकि, हर बच्चा अलग होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आप कुछ बातों का ख्याल रख कर न केवल इस समय का मजा ले पाएंगे बल्कि आपका बच्चा भी आपसे अधिक कनेक्ट हो पाएगा।

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

सूत्र
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AnuSharma द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 14/06/2021 को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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