International Men’s Day: क्या पुरुष महिलाओं से ज्यादा इमोशनल होते हैं, जानें इस मेन्स डे पर

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट नवम्बर 20, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें
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आपने हर साल महिला दिवस के  बारे में तो बहुत कुछ पढ़ा और सुना होगा, लेकिन क्या आपको पता है कि मेन्स डे भी मनाया जाता है। जी हां 19 नवंबर को हर साल इंटरनेशनल मेन्स डे के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कोशिश की जाती है कि समाज के लिए अच्छा करने वाले और रोल मॉडल पुरुषों को आगे लाया जाए, उनके सम्मान और हक की बात की जाए। हालांकि मेन्स डे को वुमेन्स डे जैसी पॉपुलैरिटी भले न मिली हो, लेकिन समाज में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता है।

कब हुई थी इंटरनेशनल मेन्स डे की शुरुआत?

जानकारों की मानें तो सबसे पहले 1923 में महिला दिवस की तर्ज पर कुछ पुरुषों ने पुरुष दिवस यानी मँनस डे मनाने की मांग की, लेकिन तब इस बात की तरफ किसी ने उतना ध्यान नहीं दिया गया। इसके बाद 1999 में त्रिनिदाद और टोबैगो के लोगों ने पहली बार इंटरनेशनल मेन्स डे मनाया। हमारे देश में डॉ. जीरोम तिलकसिंह ने पुरुषों के अधिकारों के लिए बहुत काम किया था और उनके पिता जी का जन्मदिन 19 नंवबर को होता है इसलिए इसी तारीख से हमारे देश में भी इंटरनेशनल मेन्स डे मनाने की शुरुआत हुई।

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इस साल की थीम है बेटर हेल्थ फॉर मेन्स एंड बॉएस

इंटरनेशनल मेन्स डे हर साल किसी न किसी थीम पर मनाया जाता है और इस बार की थीम है ‘Better Health for Men and Boys’ यानी पुरुषों और लड़कों की अच्छी सेहत के लिए काम करना या जागरुकता फैलना। दरअसल, जहां तक अच्छी सेहत की बात आती है तो पुरुष अपनी सेहत पर कम ही ध्यान देते हैं, आमतौर पर उन्हें लगता है कि वह महिलाओं की तुलना में कम बीमार पड़ते हैं या अधिक मज़बूत होते हैं इसलिए उन्हें अपनी सेहत को लेकर ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि दिल से जुड़ी बीमारियां पुरुषों को अधिक हो रही है। साथ ही वह अन्य बीमारियों के भी शिकार हो रहे है। इसलिए मेन्स डे के जरिए उन्हें अपनी सेहत के प्रति जागरुक करने की कोशिश की जा रही है ताकि वह खुद स्वस्थ रहे और अपने परिवार को भी सेहतमंद बना सकें।

क्या पुरुष महिलाओं से ज्यादा भावुक होते हैं?

अक्सर देखा जाता है कि माहिलाओं को ज्यादा भावुक जाता है और पुरुषों को कठोर, पर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। इस बारे में पीजीआई हॉस्पिटल की मनोवैज्ञानिक डाॅक्टर अनंत मल्होत्रा का कहना है कि पुरुष महिलाओं से ज्यादा भावुक होते हैं। वो कठोर बने रहते हैं, लेकिन अंदर से उनता ही कमजोर होते हैं। बस वो अपनी बात महिलाओं की तरह कहना नहीं जानते हैं। लेकिन उन्हें भी इमाेशनल स्पोर्ट की जरूरत होती है। पुरुषों की इमोशंस के अलावा अन्य बातों का भी ध्यान रखना चाहिए-

हर पुरुष बुरा नहीं होता

दरअसल, हमारे पुरुष प्रधान समाज में शुरुआत से ही महिलाओं का अधिक शोषण हुआ है और उनकी आवाज़ दबाई गई है, लेकिन ऐसा नहीं है कि पुरुषों का शोषण नहीं हुआ या उन्हें अत्याचार का सामना नहीं करना पड़ा है। बहुत से ऐसे पुरुष हैं जिन्हें भेदभाव, शोषण आदि का सामना करना पड़ा है और महिलाओं की तरह ही ऐसे पुरुषों की भी मदद की जानी चाहिए। पुरुषों के अधिकार, स्वास्थ्य, उनके सकारात्मक गुण और समानता के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए ही मेन्स डे मनाया जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अब पुरुषों के भी समान अधिकारों की बात होने लगी है। भारत में 19 नवंबर 2007 से इंटरनेशनल मेन्स डे मनाने की शुरुआत हुई यानी यह कॉन्सेप्ट अभी नया ही है हमारे लिए। शायद इसलिए इसे महिला दिवस जितनी लोकप्रियता नहीं मिली है। लेकिन आप अपनी ज़िंदगी के अहम पुरुष पिता/पति/भाई को इस दिन खास महसूस कराने के लिए उन्हें कोई तोहफा जरूर दे सकते हैं।

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मर्द को भी दर्द होता है

दरअसल, हमारे देश में पुरुषों को लेकर धारणा है कि वह बहुत मज़बूत होते हैं और आंसू बहाना तो कमज़ोर औरतों का काम है। ऐसी धारणा के कारण ही पुरुष कई बार अपनी भावनाएं ज़ाहिर नहीं कर पातें और अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। इसकी वजह से कई मानसिक परेशानियों से घिर जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि हमारे देश में जागरुकता की कमी है। लोग भूल जाते हैं कि पुरुष भी इंसान होते हैं और उन्हें भी किसी की बातें बुरी लग सकती है, उन्हें भी दर्द होता है और अपने दर्द को यदि वह आंसुओं के ज़रिए बाहर निकालते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है और यह कतई उन्हें कमज़ोर नहीं बनाता है। इंटरनेशनल मेन्स डे के मौके पर पुरुषों के इमोशनल हेल्थ के बारे में भी जागरुकता फैलने की जरूरत है।

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 महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक आत्महत्या करते हैं

हमारे समाज में भले ही औरतों को कमजोर कहा जाता हो, लेकिन आंकड़ें बताते हैं कि पुरुष ज़िंदगी के मामले में महिलाएं से पहले हिम्मत हार जाते हैं। इंटरनेशनल मेन्स डे पर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ें देखें तो पता चलता है कि महिलाओं की तुलना में ज़्यादा पुरुष आत्महत्या करते हैं। आंकड़ों के अनुसार आत्महत्या करने वालों में 30 से 45 साल के पुरुषों की संख्या अधिक है। इसकी एक बड़ी वजह हो सकती है कि पुरुष अपने दिल की बात जल्दी किसी के साथ शेयर नहीं कर पाते और अंदर ही अंदर टूट जाते हैं, जबकि महिलाएं दूसरों से अपनी बातें जल्दी साझा कर लेती हैं। पुरुष अपनी कमजोरियों को भी स्वीकार नहीं कर पातें। ऐसे में यदि कोई बात उनके दिल में लग जाती है तो उसे जल्दी मन से निकाल नहीं पाते हैं और उसे अपने आत्मसम्मान, प्रतिष्ठा से जोड़कर देखने लगते हैं। नतीजतन कई बार डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं और अपनी जिंदगी भी खत्म कर लेते हैं। घरेलू हिंसा शब्द का जिक्र होते ही आमतौर पर हमारे सामने पीड़ित महिला की छवि आती है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं, लेकिन अपने साथ हुई हिंसा के बारे में वह किसी से बोल नहीं पाते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि ‘लोग क्या सोचेंगे।’ पुरुषों के साथ हुई घरेलू हिंसा के मामले कम ही रिपोर्ट किए जाते हैं।

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देखा जाए तो महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा भावुक होते हैं। लेकिन वो अपनी बात कह नहीं पाते हैं, जिस वजह से वो देखने में सिफ कठोर लगते हैं। महिलाओं को भी पुरुषों की भावनाओं को समझना चाहिए।

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