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क्यों नवजात शिशुओं को ज्यादा परेशान करती है हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम की समस्या?

क्यों नवजात शिशुओं को ज्यादा परेशान करती है हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम की समस्या?

हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) वो स्थिति है जिसमें हमारे शरीर में खून आर्टरीज (Arteries) यानी धमनियों के माध्यम से फ्री हो कर बहने में सक्षम नहीं हो पाता। इस समस्या में ब्लडस्ट्रीम में बहुत अधिक रेड ब्लड सेल्स (Red Blood Cells), वाइट ब्लड सेल्स (White Blood Cells) और प्रोटीन (Protein) होने के कारण आर्टेरियल ब्लॉकेज (Arterial Blockages) हो जाता है। यह परेशानी किसी भी असामान्य शेप के रेड ब्लड सेल्स जैसे सिकल सेल एनीमिया (Sickle Cell Anemia) के साथ भी हो सकती है।

हायपरविस्कोसिटी की बीमारी बच्चों और वयस्कों सभी को हो सकती है। इसके कारण हार्ट, आंतों, गुर्दे और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों में रक्त के प्रवाह कम हो जाता है, जिससे बच्चों में इन अंगों का विकास प्रभावित होता है। वयस्कों में यह परेशानी ऑटोइम्यून डिजीज जैसे रयूमेटाइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis) के साथ भी हो सकती है। यह रोग ब्लड कैंसर जैसे लिंफोमा (Lymphoma) और ल्यूकेमिया (Leukemia) के साथ भी विकसित हो सकता है। आइए जानते हैं इसके लक्षणों के बारे में:

हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम के लक्षण क्या हैं? (Symptoms of Hyperviscosity Syndrome)

हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) उन लक्षणों का समूह, है जो खून में विस्कोसिटी के अधिक होने पर बढ़ते हैं। हाय ब्लड विस्कोसिटी में म्यूकस मेम्ब्रेन (Mucous Membranes) से ब्लीडिंग होना, रेटिनोपैथी के कारण नजर में समस्या (Visual Disturbances) और कई न्यूरोलॉजिकल लक्षण (Neurological symptoms) जिसमें सिरदर्द और वर्टिगो से सीजर्स और कोमा आदि भी शामिल हैं। हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) के लक्षणों में सिरदर्द (Headache), सीजर्स (Seizures) और त्वचा का लाल होना आदि भी हैं।

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बच्चों में हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम के लक्षण (Symptoms of Hyperviscosity Syndrome in Children)

अगर आपका नवजात शिशु अधिकतर सो रहा हो या अच्छे से फीड न ले रहा हो, तो यह किसी समस्या का संकेत हो सकता है। इस स्थिति के लक्षण जटिलताओं का परिणाम होते हैं, जो तब होते हैं जब महत्वपूर्ण अंगों को रक्त के माध्यम से पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती है।

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हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम के अन्य लक्षण इस प्रकार हो सकते हैं (Other Symptoms of Hyperviscosity Syndrome)

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हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम के कारण क्या हैं? (Hyperviscosity Syndrome causes)

ऐसा माना जाता है कि हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) ब्लड के सेलुलर या प्रोटीन फ्रैक्शंस के पैथोलॉजिकल परिवर्तनों (Pathological Changes) के कारण होते हैं। हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) उस स्थिति के कारण भी हो सकता है, जो ब्लड सेल प्रोडक्शन को प्रभावित करती है, जैसे:

  • ल्यूकेमिया (Leukemia): यह एक ब्लड कैंसर है, जिसके परिणामस्वरूप व्हाइट ब्लड सेल्स की संख्या बढ़ जाती है।
  • पोलीसाइथिमिया वेरा ( Polycythemia Vera) : यह एक ब्लड कैंसर है, जिसके कारण रेड ब्लड सेल्स की संख्या बढ़ जाती है।
  • एसेंशियल थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (Essential Thrombocytopenia) : एक ब्लड कंडीशन है जो तब होती है जब बोन मैरो बहुत अधिक ब्लड प्लेटलेट्स बनाता है।
  • मायेलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम (Myelodysplastic Disorders)

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यह ब्लड डिसऑर्डर का एक ग्रुप है। जो कुछ खास ब्लड सेल्स के एब्नार्मल नंबर्स का कारण बनता है। यह (Bone Marrow) में स्वस्थ कोशिकाओं को बाहर निकालना और अक्सर गंभीर एनीमिया का कारण भी बन सकता है। वयस्कों में, हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) आमतौर पर इन लक्षणों का कारण तब बनता है जब ब्लड विस्कोसिटी 6 और 7 के बीच होती है, जिसे सेलाइन के रिलेटिव मापा जाता है। लेकिन, यह कम भी हो सकता है। इसकी सामान्य वैल्यू आमतौर पर 1.6 और 1.9 के बीच होते हैं। इस स्थिति उपचार के दौरान, इसका लक्ष्य व्यक्ति के लक्षणों को कम करने के लिए आवश्यक स्तर तक विस्कोसिटी को कम करना होता है।

नवजात शिशुओं में इसके कारण (Cause of This Problem in Newborns)

नवजात शिशुओं में इस सिंड्रोम का निदान तब होता है। जब कुल रेड ब्लड सेल का लेवल 65 परसेंट से अधिक होता है। ऐसा कई स्थितियों के कारण हो सकता है जो गर्भ के दौरान या जन्म के समय विकसित होती हैं। इनमें यह सब शामिल है:

यह उन स्थितियों के कारण भी हो सकता है जिनमें आपके बच्चे के शरीर के ऊतकों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचती है।

नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन (National Center for Biotechnology Information) के अनुसार कोई सेलुलर कॉम्पोनेन्ट जैसे एरिथ्रोसाइट्स (Erythrocytes), प्लेटलेट्स (Platelets) आदि के पैथोलॉजिकल एलिवेशन या खून के अकोशिकीय घटक (Acellular Components) यानी प्रोटीन (Protein) हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम का कारण बन सकते हैं। जो स्थिति इस समस्या का कारण बनती हैं। उनमें ल्यूकेमिया (Leukemia), पॉलीसिथेमिया वेरा (Polycythemia vera) आदि शामिल है। कुछ लोगों को इस समस्या का रिस्क अधिक रहता है, जानते हैं उनके बारे में:

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हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम के जोखिम किसे अधिक होते हैं? (Risk for Hyperviscosity Syndrom)

हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) की समस्या अधिकतर नवजात शिशुओं को प्रभावित करता है। लेकिन, यौवन में भी यह समस्या हो सकती है। इस समस्या की कार्यप्रणाली इसके कारणों पर निर्भर करती है। कुछ लोगों को यह परेशानी होने का जोखिम अधिक होता है, जो इस प्रकार हैं:

  • अगर आपके परिवार में इस समस्या की फैमिली हिस्ट्री है तो आपको यह सिंड्रोम होने का जोखिम अधिक होगा।
  • अगर आपको गंभीर बोन-मैरो कंडीशंस (Bone Marrow Conditions) हैं, तो आपमें हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) का जोखिम अधिक होगा।

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हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम का निदान कैसे किया जाता है? (Diagnosis of Hyperviscosity Syndrome)

हायपरविस्कोसिटी एक अंडरलेयिंग प्रक्रिया (Underlying Oncologic Process) का एक क्लीनिकल मेनिफेस्टेशन (clinical manifestation) है। एक समस्या के निदान के लिए कोई एक टेस्ट नहीं है। डॉक्टर इस स्थिति के निदान के लिए सबसे पहले रोगी के लक्षण और मेडिकल हिस्ट्री के बारे में जानते हैं। इसके साथ ही शारीरिक जांच भी की जाती है। इसके लिए यह टेस्ट कराने के लिए भी कहा जा सकता है:

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हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम

हाइयपरविस्कोसिटी सिंड्रोम का उपचार कैसे किया जा सकता है (How is Hyperviscosity Syndrome treated?

हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम के निदान के बाद इस समस्या का उपचार संभव है। हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) का उपचार इसके कारणों पर निर्भर करता है। अगर किसी व्यक्ति में इस स्थिति का निदान हो जाता है, तो डॉक्टर उससे जुडी जटिलताओं को मॉनिटर करते हैं। यह एक मेडिकल इमरजेंसी है और सही समय पर इसका इलाज होने से जटिलताएं दूर हो सकती हैं। इसके दौरान दी जाने वाली थेरेपी भी इसके लक्षणों पर निर्भर करती है। इसके कई लक्षण जल्दी उपचार से ठीक हो जाते हैं। इसके शार्ट-टर्म मैनेजमेंट का उद्देश्य लक्षणों को कंट्रोल करना होता है, वहीं लॉन्ग- टर्म मैनेजमेंट का उद्देश्य होता है अंडरलायिंग हेमाटोलॉजिक कंडीशन (Hematologic Conditions) को कंट्रोल करना। इस समस्या के उपचार में सपोर्टिव थेरेपी (Supportive Therapy), प्लाज्मा एक्सचेंज (Plasma Exchange) और कीमोथेरेपी (Chemotherapy) आदि शामिल हैं

सही समय पर उपचार से कई जानलेवा स्थितियों जैसे थ्रोम्बोइम्बोलिक इवेंट्स (Thromboembolic Events) या मायोकार्डियल इन्फ्रेक्शंस (Myocardial Infarction) से बचा जा सकता हैआदि। जिनका परिणाम होता है, मल्टीपल ऑर्गन फेलियर। हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) में डिहायड्रेशन भी हो सकती है। ऐसे में डिहायड्रेशन से बचने के लिए अधिक से अधिक तरल पदार्थों का सेवन करने की सलाह दी जाती है। इसके लिए डॉक्टर की राय लेना भी जरूरी है। प्लाज्मा एक्सचेंज (Plasma Exchange) या प्लास्मफेरेसिस (Plasmapheresis), भी हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) के उपचार का तरीका है। जिसमें इसमें रोगी के रक्त की लगभग 1 से 2 यूनिट को फ्लेबोटोमाइजिंग करना और साथ में ही इसे सामान्य सेलाइन (Saline) के साथ बदलना शामिल है। इसके साथ ही डॉक्टर लक्षणों को दूर करने के लिए कुछ दवाईयां लेने की सलाह भी दे सकते हैं।

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हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) के निश्चित उपचार में अंडरलेयिंग हेमटोलोगिक स्थिति (Underlying Hematologic Condition) के लिए कीमोथेरेपी भी शामिल है। कई बार प्लाज्माफेरेसिस (Plasmapheresis) अंडरलेयिंग बीमारी में इफेक्टिव नहीं होता है, इसलिए कीमोथेरेपी शुरू की जाती है। जैसे ही किसी व्यक्ति में इस समस्या का निदान होता है वैसे ही इसकी कीमोथेरेपी दी जाती है ताकि जल्दी से इलाज संभव हो। अब जानिए कैसा होना चाहिए इस अवस्था में आपका लाइफस्टाइल।

हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम के लिए कैसा होना चाहिए आपका लाइफस्टाइल? (Lifestyle to manage Hyperviscosity Syndrome)

हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) हमारे खून से जुड़ा एक डिसऑर्डर है। जिसे मैनेज करने या जिससे बचने के लिए आपको कुछ चीजों का ध्यान रखना चाहिए। यह चीजें इस प्रकार हैं:

  • रोजाना फोलिक एसिड सप्लीमेंट्स (Folic Acid Suppliments) लें और हेल्दी डायट का सेवन करें। अपने आहार में फल और सब्जियों के साथ ही साबुत अनाज को भी शामिल करें। फोलिक एसिड सप्लीमेंट या अन्य विटामिन्स के लिए डॉक्टर की सलाह लें।
  • अधिक से अधिक पानी पीएं। हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम में डिहायड्रेशन (Dehydration) भी एक रिस्क फैक्टर है। ऐसे में दिन में कम से कम सात से आठ गिलास पानी पीना आवश्यक है। इसके बारे में भी आप डॉक्टर से पूछ सकते हैं।
  • रोजाना व्यायाम करना न केवल इस समस्या बल्कि शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। आपको कौन सी और कितनी देर तक व्यायाम करनी चाहिए, इसके लिए एक्सेरट्स और डॉक्टर की राय लें।
  • पर्याप्त नींद लेना भी हमारे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। इससे न केवल हमारे शरीर बल्कि दिमाग को भी आराम मिलता है। इसलिए दिन में आठ घंटे की नींद अवश्य पूरी करें। इसके साथ ही तनाव से भी बचें। तनाव से बचने के लिए योगा करें (Yoga), मेडिटेशन करें (Meditation) और सकारात्मक रहें (Be Positive)। अधिक समस्या होने पर मेडिकल हेल्प लें।

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वयस्कों में हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम (Hyperviscosity Syndrome) का अक्सर कारण एक अंडरलायिंग कंडीशन जैसे ल्यूकेमिया होती है। हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम के उपचार के लिए पहले इस स्थिति का उपचार जरुरी है। अगर आपके शिशु में हायपरविस्कोसिटी सिंड्रोम का माइल्ड लक्षण नजर आते हैं, तो इसके तुरंत उपचार की जरूरत नहीं होती है। लेकिन अगर इस समस्या का कारण जेनेटिक है, तो इसके लिए लॉन्ग-टर्म ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ सकती है। अगर आपको इस समस्या का कोई भी लक्षण नजर आता है या आप अपने बच्चे के व्यवहार, फीडिंग या स्लीपिंग पैटर्न में परिवर्तन नोटिस करते हैं, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें। सही समय पर निदान और उपचार से जल्दी रिकवर होने में मदद मिलती है और साथ ही अन्य जटिलताओं से भी बचा जा सकता है।

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सूत्र

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AnuSharma द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 19/05/2021 को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड