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हायपोफॉस्फेटेमिया: फॉस्फोरस की कमी के कारण हो सकती है यह बीमारी, समय पर इलाज है जरूरी!

हायपोफॉस्फेटेमिया: फॉस्फोरस की कमी के कारण हो सकती है यह बीमारी, समय पर इलाज है जरूरी!

फॉस्फोरस हड्डियों में पाया जाने वाला वो मिनरल है जो हड्डियों और शरीर को हेल्दी बनाने रखने में मददगार होता है। शरीर में सामान्य ब्लड फॉस्फोरस लेवल (Blood Phosphorus Level) को 2.5 to 4.5 mg/dL के बीच का माना जाता है। हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) उस स्थिति को कहा जाता है, जिसमें ब्लड में फॉस्फोरस का लेवल बहुत कम हो जाता है या फॉस्फोरस की कमी हो जाती है। इसके लो लेवल कई हेल्थ चैलेंजेज का कारण बन सकता है जिसमें मसल्स का कमजोर होना (Weak muscle), रेस्पिरेटरी (Respiratory) या हार्ट फेलियर (Heart Failure), सीजर (Seizure), कोमा (Coma) आदि शामिल हैं। यह समस्या केवल वयस्कों ही नहीं बल्कि बच्चों को भी हो सकती है। हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) के कारण कुछ अन्य अंडरलायिंग समस्याएं भी हो सकती हैं। यह एक गंभीर स्थिति है और हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) के कारण होने वाली गंभीर समस्याओं से बचने के लिए सबसे पहले इसका कारण बनने वाली अंडरलायिंग परेशानियों से बचना चाहिए। आइए जानते हैं क्या हैं इसके कारण।

हायपोफॉस्फेटेमिया के कारण (Causes of Hypophosphatemia‌)

हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) के दो प्रकार हैं एक एक्यूट और दूसरा क्रॉनिक। इन दोनों के कारण भी एक-दूसरे से बिलकुल अलग हैं। एक्यूट हायपोफॉस्फेटेमिया (Acute Hypophosphatemia‌) बहुत जल्दी विकसित होता है। जबकि क्रॉनिक हायपोफॉस्फेटेमिया (Chronic Hypophosphatemia‌) धीरे-धीरे विकसित होता है। आइए जानें इनके बारे में विस्तार से:

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एक्यूट हायपोफॉस्फेटेमिया (Acute Hypophosphatemia‌)

एक्यूट हायपोफॉस्फेटेमिया (Acute Hypophosphatemia‌), हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) का गंभीर और सामान्य प्रकार हैं। इसके कारण इस तरह से हैं:

  • डायबिटिक कीटोएसिडोसिस से रिकवरी (Diabetic ketoacidosis Recovery) : डायबिटिक कीटोएसिडोसिस (Diabetic ketoacidosis) की समस्या तब होती है, जब मरीज की डायबिटीज अनियंत्रित हो जाती या मरीज को यह पता भी नहीं होता कि उसे यह समस्या है। यह वो स्थिति है जब शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता है। अगर किसी को यह समस्या होती है तो उसकी ब्लडस्ट्रीम में एसिड बिल्डअप होता जिसके कारण बेहोशी या मृत्यु भी हो सकती है। यह स्थिति हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) का कारण सकती है।
  • क्रॉनिक एल्कोहॉलिज्म (Chronic Alcoholism) : वयस्कों में हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) का एक कारण अधिक शराब का सेवन माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि समय के साथ अधिक शराब का सेवन करने से किडनी की फॉस्फोरस एब्सॉर्ब करने की क्षमता प्रभावित होती है।
  • बर्न्स (Burns) : फॉस्फेट इंट्रासेल्युलर ऊर्जा (Intracellular energy) का एक स्रोत है, और जब किसी को गंभीर जलन का अनुभव होता है, तो उनके फॉस्फेट का स्तर खतरनाक रूप से कम हो जाता है। इसलिए, रोगियों को स्वस्थ रहने के लिए फॉस्फेट सप्लीमेंट्स का सेवन करना चाहिए।

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क्रॉनिक हायपोफॉस्फेटेमिया (Chronic Hypophosphatemia‌)

क्रॉनिक हायपोफॉस्फेटेमिया (Chronic Hypophosphatemia‌) का कारण किडनी की समस्याएं और उनकी फॉस्फोरस को एब्सॉर्ब करने की क्षमता है। इसके उदाहरण इस प्रकार हैं?

  • कुपोषण /सेमिस्टारवेशन (Malnutrition/semistarvation) : अधिक समय तक भूखें रहने या कुपोषण के कारण समय के साथ शरीर में मौजूद फॉस्फोरस कम हो सकता है। इसके अन्य कारणों में क्रॉनिक इंफेक्शंस (Chronic infections), क्रोहन’स डिजीज (Crohn’s disease )आदि शामिल हैं। बच्चों में हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) का यह मुख्य कारण है।
  • हार्मोनल कंडिशंस (Hormonal conditions) : कुशिंग सिंड्रोम (Cushing syndrome) और हायपोथायरायडिज्म (Hypothyroidism) का भी शरीर पर वैसे ही असर होता है। जैसे हायपरपैराथायरॉइडिज्म (Hyperparathyroidism) का पड़ता है। जैसे इनके कारण शरीर की ब्लड स्ट्रीम में फॉस्फोरस असामान्य लेवल तक पहुंच सकता है।
  • विटामिन D डेफिशियेंसी (Vitamin D deficiency) :विटामिन डी की कमी हड्डियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है और हड्डियों की खनिज बनाने की क्षमता को कम करती है।
  • इलेक्ट्रोलायट संबंधी समस्या (Issues with electrolytes) : हायपोकेलिमिया (Hypokalemia) और हायपोमेग्नीसिमिया (Hypomagnesemia) जैसे डिसऑर्डर्स शरीर की एलेक्ट्रोलाइट्स को जनरेट और एब्सॉर्ब करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं और हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) का कारण बन सकता है।
  • डाययूरेटिक्स और एंटासिड्स (Diuretics and antacids) : डाययूरेटिक्स और एंटासिड्स (Diuretics and antacids) : डाययूरेटिक्स और एंटासिड्स (Diuretics and antacids) का लंबे समय तक प्रयोग करना किडनी की फॉस्फोरस को एब्सॉर्ब करने की क्षमता को प्रभावित करता है। जिससे क्रॉनिक हायपोफॉस्फेटेमिया (Chronic Hypophosphatemia‌) जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

यह तो थे इसके कारण अब जान लेते हैं इस समस्या से जुड़े रिस्क फैक्टर्स के बारे में।

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हायपोफॉस्फेटेमिया के रिस्क फैक्टर्स (Risk factors of Hypophosphatemia‌)

हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) का प्रभाव हमारी हड्डियों और दांतों पर पड़ता है। यह समस्या बच्चों को होने से उनकी हड्डियां कमजोर और नरम हो जाती हैं। अगर आपके बच्चों को यह समस्या है तो आपको इसके लक्षण तब देखने को मिल सकते हैं। जब बच्चा बड़ा होता है और वॉक करना शुरू करता है। हालांकि बच्चे के पूरी तरह से विकसित होने के बाद भी इसके प्रभावों को देखा जा सकता है। जिसमें हड्डियों, जोड़ों और दांतों में समस्याएं आदि शामिल हैं। बच्चों के लिए इस समस्या के रिस्क फैक्टर्स इस प्रकार हैं:

  • अगर पेरेंट्स या किसी क्लोज फैमिली मेंबर को यह समस्या हो (Same Problem to any family member)
  • ब्लड इन्फेक्शन (Blood infection)
  • हायपरपैराथायरायडिज्म (Hyperparathyroidism)
  • बच्चे का भुखमरी या एनोरेक्सिया (Anorexia) के कारण गंभीर रूप से कुपोषित होना (Malnourished)
  • स्टेरॉइड्स (Steroids), एंटासिड्स (Antacids) , डाययूरेटिक्स (Diuretics) ,जैसी दवाईयों का अधिक या लम्बे समय तक सेवन करना। जानिए क्या हैं इस समस्या के लक्षण ?

हायपोफॉस्फेटेमिया

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हायपोफॉस्फेटेमिया के लक्षण (Symptoms of Hypophosphatemia‌)

जैसा की पहले ही बताया गया है कि हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) की समस्या हमेशा अंडरलायिंग कंडिशंस के कारण होती है। हालांकि अधिकतर लोगों में इसके कोई लक्षण नजर नहीं आते हैं। लेकिन, बच्चों में इसके लक्षण इस प्रकार हैं:

वयस्कों में भी कुछ लक्षण बच्चों के समान ही होते हैं, यह लक्षण इस प्रकार हो सकते हैं

  • मसल्स और हड्डियों का कमजोर और नरम होना (Week and tendon muscles and bones)
  • क्रॉनिक डिप्लेशन (Chronic depletion)
  • मसल्स का डिप्लेशन (Depletion of muscles)
  • ब्लड की समस्या (Issues with the blood)
  • मेंटल स्टेट में समस्या (Altered mental state
  • सीज़र (Seizures)
  • सुन्नता (Numbness)
  • रिफ्लेक्सिव वीकनेस (Reflexive weakness)
  • हार्ट फेलियर (Heart failure)
  • मसल पेन (Muscle pain‌)

हालांकि, कुछ लोगों को इसके अलावा अन्य लक्षण भी नजर आ सकते हैं। हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) से पीड़ित अधिक लोगों में इसके अधिकतर लक्षण नजर नहीं आते हैं। जानिए कैसे होता है इसका निदान?

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हायपोफॉस्फेटेमिया का निदान (Diagnosis of Hypophosphatemia‌)

हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) के निदान के लिए डॉक्टर सबसे पहले रोगी से लक्षणों के बारे में जानते हैं। शरीर में फॉस्फोरस की कमी के कारण बोन और डेंटल प्रॉब्लम हो सकती है। इस बीमारी का निदान बच्चे पर होने वाले इसके प्रभावों को पहचानने के साथ भी किया जा सकता है। इस समस्या से पीड़ित बच्चों की ग्रोथ धीमी होती है और उनका स्कल साइज (Skull Size) भी समान्य से कम होता है। इसके साथ ही उनकी टांगे भी मुड़ी हुई हो सकती है क्योंकि उनकी हड्डियां कमजोर होती है। इसके निदान के लिए डॉक्टर इन टेस्ट्स की सलाह दे सकते हैं :

  • इमेजिंग टेस्ट्स (Imaging Tests): बोन्स के लिए इमेजिंग टेस्ट की सलाह दी जा सकती है जिसमें एक्स-रे (X-rays,) कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी (Computerized Tomography) स्कैन और बोन स्कैन (Bone Scan) आदि शामिल है।
  • ब्लड टेस्ट्स (Blood Tests) : ब्लड टेस्ट्स आमतौर पर आवश्यक होते हैं क्योंकि हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) ब्लड टेस्ट अब्नोर्मलिटीज़ जैसे लो कैल्शियम (Low Calcium) और विटामिन डी लेवल्स (Vitamin D levels) से जुडी हुई समस्या है।
  • जेनेटिक टेस्ट (Genetic Test) : एक जेनेटिक टेस्ट उस म्युटेशन की पहचान कर सकता है जो इस स्थिति का कारण बनता है। लेकिन आपको हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) का निदान करने के लिए जेनेटिक टेस्ट की आवश्यकता है या नहीं यह बात डॉक्टर निर्धारित करते हैं। फैमिली हिस्ट्री से भी इस समस्या का क्लू मिल सकता है। मेडलायन प्लस (Mediline Plus) के अनुसार इस रोगी के निदान के लिए किडनी फंक्शन टेस्ट्स (Kidney function tests) और विटामिन डी ब्लड टेस्ट (Vitamin D blood Test) भी कराए जा सकते हैं। इन टेस्ट्स से एनीमिया और हार्ट मसल्स डैमेज के बारे में जाना जा सकता है। इसके निदान के लिए डॉक्टर रोगी की मेडिकल हिस्ट्री भी जांचते हैं। इसके बाद इस बीमारी का उपचार किया जा सकता है। उपचार के तरीकों के बारे में भी जानिए।

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हायपोफॉस्फेटेमिया का ट्रीटमेंट (Treatment of Hypophosphatemia‌)

हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) पूरे शरीर को प्रभावित करता है। यही नहीं इससे इंट्रासेल्युलर स्तर (Intracellular level) भी प्रभावित होता है इससे निम्नलिखित समस्याएं हो सकती हैं:

  • बोन डिजीज जैसे रिकेट्स (Rickets), ऑस्टियोपीनिया (Osteopenia), ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis)
  • शरीर में सुइयां चुभने जैसे फीलिंग (Feeling like pricking needles)
  • सुन्न होना (Numbness)
  • कोमा (Coma)
  • हार्ट फेलियर (Heart Failure)
  • वाइट ब्लड सेल्स की कमी (Lack of white blood cells)
  • इम्युनिटी का कम होना (Week Immunity)

हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) के कारण मृत्यु भी हो सकती है इसलिए इनका उपचार करना बहुत जरूरी है। चाहे इसके लक्षण इतने भी गंभीर न हों। इसके उपचार में फॉस्फोरस सप्लीमेंट्स भी शामिल हैं। लेकिन इस सप्लीमेंट्स को रोगी को देना इस स्थिति की गंभीरता पर निर्भर करता है। हायपोफॉस्फेटेमिया के माइल्ड मामलों में ओरल फॉस्फोरस सप्लीमेंट से उपचार हो सकता है। लेकिन, गंभीर मामलों में इंट्रावेनस सप्लिमेंटेशन (Intravenous Supplementation) की जरूरत हो सकती है।

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जटिलताएं और इससे जुड़ी स्थितियां

हेल्दी बोन्स के लिए फॉस्फेट का शरीर में होना बेहद जरूरी है। फॉस्फोरस की कमी होने से हड्डियों का कमजोर होना फ्रैक्चर और मसल डैमेज हो सकती है। गंभीर हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) की स्थिति जिसका अगर उपचार न किया जाए तो इससे ब्रीदिंग (Breathing) और हार्ट फंक्शन (Heart Function) भी प्रभावित हो सकता है और यह जानलेवा भी हो सकता है। हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) से जुडी जटिलताएं इस प्रकार हैं :

  • मसल टिश्यू का नष्ट होना (Death of muscle tissue)
  • ब्रीदिंग फेलियर (Breathing failure)
  • रेड ब्लड सेल डिस्ट्रक्शन (Red blood cell destruction)
  • असामान्य हार्ट रिदम (Irregular heart rhythm)

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हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) की समस्या को आसानी से मैनेज किया जा सकता है। यही नहीं, इसके माइल्ड मामलों में आप अपनी डाइट में केवल फॉस्फेट को शामिल करके और सप्लीमेंट लेकर आप इस स्थिति को सुधार सकते हैं। इसके अलावा फॉस्फोरस की कमी के कारण होने वाली समस्याओं के लिए डॉक्टर आपको सही ट्रीटमेंट बता सकते हैं। अगर हायपोफॉस्फेटेमिया (Hypophosphatemia‌) का कारण कोई अंडरलायिंग मेडिकल स्थिति है तो भी डॉक्टर आपको इसके इलाज के लिए दवाईयों और अन्य चीजों की सलाह दे सकते हैं। एक बार जब इस स्थिति का सही से उपचार कर लिया जाता है तो यह समस्या फिर से नहीं होती है।

अपने बच्चे को इस स्थिति से बचाने के लिए शुरू में ही डॉक्टर और डेंटिस्ट की राय ले लें। इसके साथ ही उन्हें हेल्दी आदतें अपनाने के लिए कहें जैसे सही और पौष्टिक आहार का सेवन, नियमित व्यायाम करना आदि। इन आदतों को अपना कर न केवल आपके बच्चे इस रोग से बच सकते हैं बल्कि पूरी उम्र स्वस्थ रहने में भी उन्हें मदद मिलेगी। अधिक जानकारी के लिए या आपके मन में कोई भी सवाल है तो तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह लें।

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

सूत्र

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AnuSharma द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 31/07/2021 को
डॉ. हेमाक्षी जत्तानी के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
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