एनवायरमेंटल डिजीज क्या हैं और यह लोगों को कैसे प्रभावित करती हैं?

चिकित्सक द्वारा समीक्षित | द्वारा

अपडेट डेट April 21, 2020 . 6 मिनट में पढ़ें
अब शेयर करें

कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भारत में यह कहावत काफी प्रचलित है। यहां कदम-कदम पर अलग-अलग भाषाएं बोलीं जाती है वहीं लोगों के पहनावे के साथ संस्कृति यहां तक की जलवायु में भी बदलाव दिखता है। ऐसे में पर्यावरण बदलाव होने पर उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक के लोगों को सावधान होने की जरूरत होती है। वहीं समुद्री इलाकों के साथ पहाड़ी, समतल इलाकों में जहां मौसम सामान्य की तुलना में अलग होता है वहां के लोगों को बदलते मौसम में  एनवायरमेंटल डिजीज होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। एनवायरमेंटल डिजीज को लेकर क्या सावधानी बरतनी चाहिए आइए जानते हैं इस आर्टिकल में।

क्या है एनवायरमेंट डिजीज, लोगों को किस प्रकार करती हैं प्रभावित?

वातावरण के कारण कई बीमारियां हो सकती हैं। जमशेदपुर  में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में बीते 25 वर्षों से सेवा दे रहे मेडिकल ऑफिसर एमबीबीएस डॉ. उदय कुमार सिंहा बताते हैं कि,”एनवायरमेंटल डिजीज में कई प्रकार की बीमारियां आती हैं। वायरल के कारण होने वाली बीमारी, किसी संक्रमित व्यक्ति के छूने और खांसने के कारण या फिर उसके संपर्क में आने से, वातावरण के कारण, एनवायरमेंट में बदलाव होने से बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से भी बीमारी हो सकती है। ये सभी एनवायमेंटल डिजीज में आती हैं।  ऐसे में जरूरी है कि एनवायरमेंटल डिजीज से बचाव को लेकर सतर्क रहा जाए।”

यह भी पढ़ें :Viral Syndrome: वायरल सिंड्रोम क्या है?

मौसमी बीमारी क्या होती हैं?

भारत में सामान्य तौर पर गर्मी, सर्दी, बरसात का मौसम अहम है।  डॉ. उदय कुमार सिन्हा के अनुसार वातावरण के कारण बीमारियां व एनवायरमेंटल डिजीज में ऐसी बीमारियां आती हैं जो मौसम के बदलने पर होती है। ऐसे में जरूरी है कि जब भी मौसम परिवर्तन हो तो सतर्क हो जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि बदलते मौसम के दौरान वायरस-बैक्टीरिया सामान्य रूप से ज्यादा एक्टिव होते हैं। इसके कारण लोगों के संक्रमित होने की संभावना भी बढ़ जाती है। इन्हें हम मौसमी बीमारी भी कहते हैं।

डॉ उदय कुमार सिन्हा
Dr. Uday Kumar Sinha

गर्मी में होने वालीं एनवायरमेंटल डिजीज

डॉ. सिन्हा बताते हैं कि गर्मी के मौसम में होने वाली एनवायरमेंटल डिजीज में सामान्य तौर पर स्किन संबंधी बीमारी घमौरी, लू या हीट स्ट्रोक लगना, डिहाइड्रेशन व लूज मोशन, डायरिया व डिसेंट्री जैसी समस्या हो सकती है। ऐसे में जरूरी है कि वातावरण के कारण होने वाली बीमारियों से बचने के लिए इन प्रकार की बीमारी से बचें। वहीं बीमारी के लक्षण दिखते ही डाॅक्टरी सलाह ली जाए।

यह भी पढ़ें : मां को हो सर्दी-जुकाम तो कैसे कराएं स्तनपान?

ज्यादातर बच्चों में होती हैं घमौरियां

एनवायरमेंटल डिजीज में घमौरी का नाम सबसे पहले आता है। जनरल फिजिशियन डॉ उदय बताते हैं कि यह बीमारी वैसे तो किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है, लेकिन ज्यादातर बच्चों में पांच से लेकर 15 की उम्र के बच्चों में देखने को मिलती है। बीमारी होने के कारणों का अब तक साफ साफ पता नहीं चल पाया जा, लेकिन माना जाता है कि यह बीमारी शरीर में डिहाइड्रेशन के कारण होती है। यानि शरीर में पानी की कमी होने से यह बीमारी हो सकती है।

इस बीमारी में शरीर की स्किन रफ हो जाती है, बदन में छोटी-छोटी फुंसियां हो जाती हैं, खासतौर पर पीठ और दोनों बांह के पीछे, नाखून के छोर से कुछ निकलता है, टेढ़े मेढ़े नाखून हो सकते हैं। डिस्कंफर्ट होने के साथ जलन, खुजली होती है। शरीर में ऐसे लक्षण दिखने पर मरीज के खास तरह का पाउडर लगाने की सलाह दी जाती है, जिससे स्किन नम रहे। इसके अलावा मरीज को बार-बार नहाने और पानी की नियमित मात्रा का सेवन करने की सलाह दी जाती है। वहीं व्यस्कों को यदि यह बीमारी हो तो उन्हें पाउडर के इस्तेमाल की सलाह के साथ एंटीबायोटिक देकर इलाज किया जाता है। जरूरी है कि इस बीमारी से बचाव के लिए लक्षण दिखने पर डॉक्टरी सलाह ली जाए।

यह भी पढ़ें: एक दिन में हमारे शरीर को कितनी पानी की मात्रा की होती है जरूरत

लू- हीट स्ट्रोक से जा सकती है जान

गर्मी के दिनों में लू की समस्या काफी सामान्य और गंभीर भी है। एनवायरमेंटल डिजीज में आने वाली इस बीमारी के बारे में मेडिकल ऑफिसर डॉ. उदय सिन्हा बताते हैं कि लोग यदि गर्मी के दिनों में खास एहतियात न बरतें तो उन्हें यह बीमारी हो सकती है। घर से निकलते वक्त मुंह, नाक, कान न ढ़कें, नियमित पानी का सेवन न करें तो इस बीमारी का शिकार हो सकते हैं। शरीर में इलेक्ट्रोलाइन का बैलेंस गड़बड़ाने के कारण यह बीमारी होती है।

लू लगने से ज्यादा पसीना निकलता है। वहीं दिल की धड़कन को सामान्य रूप से धड़कने के लिए सोडियम व पोटेशियम का अहम रोल होता है, ज्यादा पसीना निकलने के कारण शरीर में सोडियम की कमी हो जाती है वहीं इसके इंबैलेंस के कारण हीट स्ट्रोक की समस्या हो सकती है। ऐसे में मरीज को अचानक बेहोशी, हार्ट अटैक, लूज मोशन, डिहाइड्रेशन, तेज बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, कमजोरी, भूख न लगना और खाना पचाने में दिक्कत आ सकती है। शरीर में इस प्रकार के लक्षण दिखे तो डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए।

इस एनवायरमेंटल डिजीज से बचाव के लिए जरूरी है कि धूप से बचाव किया जाए। घर से निकलते वक्त मुंह में कपड़ा बांधकर निकला जाए, पानी पीते रहें ताकि शरीर में पानी की कमी न हो, नमक, चीनी और पानी का घोल पीने के साथ सत्तू पानी पीना फायदेमंद होता है। इस बीमारी को हल्के में न लें, यदि सही समय पर इसका इलाज न कराया गया तो जान तक जा सकती है। यह बीमारी किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है, जो गर्मी में घर से बाहर निकलते हैं।

यह भी पढ़े: घमोरियां मिटाने के नुस्खे, जो इस गर्मी आपको देंगे राहत

बरसात में डायरिया-डिसेंट्री की समस्या

डॉ. उदय के अनुसार एनवायरमेंटल डिजीज में बरसात के मौसम में डायरिया-डिसेंट्री, कफिंग-स्नीजिंग और बुखार की समस्या हो सकती है। डायरिया की बीमारी होने से मरीज को काफी लूज मोशन होते हैं, मुंह काफी सूख जाता है (dryness of mouth), तेज बुखार, पेट का स्किन लूज होना (जब दबाते और स्किन को अपने सामान्य पोजिशन में आने समय समय लगता है तो इसकी पहचान होती है) यह बीमारी के लक्षणों में से एक है। बीमारी बढ़ जाए तो बैक्टीरियल इंफेक्शन भी हो सकता है, खाना पचाने में दिक्कत के साथ शरीर में जो खाना नहीं पचता वो बाहर आ जाता है। इसके कारण शरीर में मिनरल्स और विटामिंस की कमी आ जाती है। बीमारी को हल्के में न लेकर डॉक्टरी इलाज कराना चाहिए। वहीं यह बीमारी ज्यादातर युवाओं में देखने को मिलती है, यदि महामारी के तौर पर यह फैल जाए तो इसे कोलेरा भी कहा जाता है। मौजूदा समय में इसका टीका उपलब्ध है।

यह भी पढ़ें : गांजे से कोरोना वायरस: गांजा/बीड़ी/सिगरेट पीने वालों को कोरोना से ज्यादा खतरा

एनवायरमेंटल डिजीज में एक है कफिंग स्नीजिंग

डॉ उदय बताते हैं कि कफिंग स्नीजिंग की बीमारी एनवायरमेंटल डिजीज की श्रेणी में आती है। बीमारी के होने से सोर थ्रोट यानि गले में भारीपन, कफिंग-स्नीजिंग व बुखार भी हो सकता है। सामान्य तौर पर यह बीमारी 4-5 दिनों में पूरी तरह ठीक हो जाती है। वहीं शरीर में ऐसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए। बच्चों में इस बीमारी पर सही समय पर इलाज न किया गया तो यह आगे चलकर ब्रोंकाइटिस में तब्दील हो जाती है। ज्यादातर यह बीमारी 12 से लेकर 20 साल की उम्र के लोगों को होती है। बीमारी होने पर बड़ी वजह यदि कोई व्यक्ति तुरंत बाहर से आकर ठंडा पानी पी लेता है तो उसके कारण भी उसमें इस प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैं।

यह भी पढ़ें : कफ के प्रकार: खांसने की आवाज से जानें कैसी है आपकी खांसी?

बरसात के दिनों में फंगल इंफेक्शन से रहें सावधान

एनवायरमेंटल डिजीज में बरसात के दिनों में फंगल इंफेक्शन की बीमारी से काफी सावधान रहना चाहिए। इस बीमारी के लक्षणों में नाखून में बदलाव देखने को मिलते हैं, उसकी असामान्य ग्रोथ होती है, शेप अलग दिखता है, नाखून की ऊपरी सतह का रंग बदला होता है, वहीं पिंकनेस काफी कम दिखती है। कई बार हमारे प्राइवेट पार्ट में भी फंगल इंफेक्शन हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बरसात के दिनों में कपड़े ठीक से सूखते नहीं। इस वजह से उनमें नमी हो जाती है। ऐसे में प्राइवेट पार्ट के पास खुजली होती है, महिलाओं में व्हाइट डिस्चार्ज की समस्या भी हो सकती है। यह सामान्य तौर पर उन महिलाओं में देखने को मिलता है जो बाथरूम में न नहाकर तालाब, पोखर, नदी आदि में नहाती हैं। शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों की महिला में यह ज्यादा देखने को मिलता है। ऐसे इस बीमारी का इलाज एंटी फंगल क्रीम देकर किया जाता है। शरीर में यदि इस तरह के बदलाव दिखे तो डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए।

यह भी पढ़ें : कान में फंगल इंफेक्शन के कारण, कैसे किया जाता है इसका इलाज ?

सर्दी का इलाज न किया तो हो सकता है निमोनिया

एनवायरमेंटल डिजीज में सर्दी भी आती है। यदि इसका इलाज न किया गया तो हमारे लंग्स को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में लंग्स के पास स्टोन जैसा महसूस होता है। जब डॉक्टर उंगलियों से टेस्ट करते हैं तो लंग्स के ऊपर से ठक-ठक जैसी आवाज आती है, यदि आवाज आए तो स्थिति काफी गंभीर होती है। इस कारण लंग्स में ऑक्सीजन और कार्बनडाइऑक्साइड का बैलेंस भी गड़बड़ा जाता है। लंग्स शरीर में अच्छे से ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं कर पाते और सांस लेने में परेशानी होने के साथ ब्लड में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। सामान्य भाषा में इसे उल्टा सांस चलना भी कहा जाता है।

एनवायरमेंटल डिजीज में एलर्जी व बैक्टीरियल इंफेक्शन का खतरा

मौसम में बदलाव के कारण एलर्जी और बैक्टीरियल इंफेक्शन जैसी मौसमी बीमारी हो सकती है। इसके कारण रेस्पीरेटरी प्रॉब्लम, स्किन प्रॉब्लम और नर्वस सिस्टम में परेशानी हो सकती है। रेस्पीरेटरी प्रॉब्लम के कारण एलर्जिक ब्रोंकाइटिस की बीमारी हो सकती है। इसके होने से तेज सांस चलना, तेज बुखार के साथ गले में कफ जैसा महसूस होता है। सामान्य तौर पर यह बीमारी सात साल से लेकर 15 साल तक के बच्चों को हो सकती है। कई बार मरीज को ऑक्सीजन चढ़ाने के साथ इनहेलर की सलाह दी जाती है। ताकि उसे तुरंत रिलीफ मिले।

वहीं भारत में अलग अलग जगहों पर मौसम में परिवर्तन के कारण अलग अलग लक्षण देखने को मिल सकते हैं। जैसे हिमाचल में एलर्जी होने की वजह से स्किन में रेड पैचेस, बुखार हो सकता है। वहीं गुजरात जैसे जगहों पर शरीर में दाने, रफ स्किन होने के साथ स्किन में व्हाइट सोर्स की समस्या दिख सकती है। वहीं समुद्री इलाकों व आसपास के इलाकों के लोगों में स्किन का रंग बदलने के साथ स्ट्रेचिंग जैसा महसूस हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि एनवायरमेंटल डिजीज से बचाव के लिए बीमारी का लक्षण देख डाॅक्टरी सलाह लेनी चाहिए।

हो सकता है सीजनल एफेक्टिव डिसऑर्डर (एसएडी) 

सीजनल एफेक्टिव डिसऑर्डर की समस्या डिप्रेशन से संबंधी परेशानी है जो अक्सर मौसम के परिवर्तन के दौरान देखने को मिलती है। आपके देखते भी होंगे की कई लोग उस वक्त दुखी होते हैं जब सर्दियों का मौसम शुरू होता है या फिर तब जब गर्मियों के मौसम की शुरुआत होती है। इस बीमारी का इलाज लाइट थेरिपी या फिर दवाइयां देने के साथ साइकोथेरिपी के द्वारा किया जाता है।

अब तो आप समझ गए होंगे कि एनवायरमेंटल डिजीज क्या होती हैं और एनवायरमेंटल डिजीज से कैसे बचा जा सकता है। इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए डाॅक्टरी सलाह लें। ।

और पढ़ें

सर्दी-खांसी को दूर भगाएंगे ये 8 आसान घरेलू नुस्खे

वायरलेस ऑब्जर्व थेरिपी की मदद से टीबी का इलाज हुआ आसान

कहीं आपके शरीर के साथ सेहत को भी न बिगाड़ दे खाने की लत

आपकी सेहत के बारे में क्या बताता है अंडकोष का रंग? जानें अंडकोष का इलाज

हैलो हेल्थ ग्रुप चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार प्रदान नहीं करता है

Was this article helpful for you ?
happy unhappy
सूत्र

संबंधित लेख:

    शायद आपको यह भी अच्छा लगे

    Karvol Plus: कारवोल प्लस क्या है? जानिए इसके उपयोग और साइड इफेक्ट्स

    कारवोल प्लस की जानकारी in hindi, उपयोग, डोज, सावधानी-चेतावनी को जानने के साथ साइड इफेक्ट्स की भी लें जानकारी, किन बीमारी में होता है इसका इस्तेमाल।

    के द्वारा लिखा गया Satish singh

    खाने से एलर्जी और फूड इनटॉलरेंस में क्या है अंतर, जानिए इस आर्टिकल में

    किन खाद्य पदार्थ से हो सकती है खाने से एलर्जी, क्या खाए और क्या न खाएं? जाने से सेहत से जुड़ी हर जरूरी बात ताकि फूड एलर्जी से कर सकें बचाव।

    चिकित्सक द्वारा समीक्षित Dr. Pranali Patil
    के द्वारा लिखा गया Satish singh
    आहार और पोषण, स्वस्थ जीवन April 23, 2020 . 7 मिनट में पढ़ें

    Clonidine Suppression Test : क्लोनिडीन सप्रेशन टेस्ट

    जानिए क्लोनिडीन सप्रेशन टेस्ट की मूल बातें, टेस्ट कराने से पहले जानने योग्य बातें, और टेस्ट के परिणामों को समझें Clonidine Suppression Test क्या होता है।

    चिकित्सक द्वारा समीक्षित Dr. Pranali Patil
    के द्वारा लिखा गया Shivam Rohatgi
    स्वास्थ्य, मेडिकल टेस्ट April 20, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें

    Antineutrophil Cytoplasmic Antibodies Test-एंटी-न्यूट्रोफिल साइटोप्लाज्मिक एंटीबॉडी (एएनसीए) टेस्ट क्या है?

    जानिए एंटी-न्यूट्रोफिल साइटोप्लाज्मिक एंटीबॉडी टेस्ट की मूल बातें, टेस्ट से पहले जानने योग्य बातें, एएनसीए टेस्ट क्या होता है, रिजल्ट को समझें।

    चिकित्सक द्वारा समीक्षित Dr. Pranali Patil
    के द्वारा लिखा गया Shivam Rohatgi
    स्वास्थ्य, मेडिकल टेस्ट April 20, 2020 . 4 मिनट में पढ़ें

    Recommended for you

    सिनारेस्ट एलपी टैबलेट Sinarest LP Tablet

    Sinarest LP Tablet : सिनारेस्ट एलपी टैबलेट क्या है? जानिए इसके उपयोग और साइड इफेक्ट्स

    चिकित्सक द्वारा समीक्षित Dr. Pranali Patil
    के द्वारा लिखा गया Shayali Rekha
    प्रकाशित हुआ August 27, 2020 . 5 मिनट में पढ़ें
    बैंडी सिरप

    Bandy Syrup: बैंडी सिरप क्या है? जानिए इसके उपयोग और साइड इफेक्ट्स

    चिकित्सक द्वारा समीक्षित Dr. Pranali Patil
    के द्वारा लिखा गया Satish singh
    प्रकाशित हुआ June 25, 2020 . 6 मिनट में पढ़ें
    जिरकोल्ड, Zyrcold

    Zyrcold: जिरकोल्ड क्या है? जानिए इसके उपयोग और साइड इफेक्ट्स

    चिकित्सक द्वारा समीक्षित Dr. Pranali Patil
    के द्वारा लिखा गया Satish singh
    प्रकाशित हुआ June 19, 2020 . 6 मिनट में पढ़ें
    ग्रिलिंक्टस बीएम

    Grilinctus BM: ग्रिलिंक्टस बीएम क्या है? जानिए इसके उपयोग और साइड इफेक्ट्स

    चिकित्सक द्वारा समीक्षित Dr. Pranali Patil
    के द्वारा लिखा गया Satish singh
    प्रकाशित हुआ June 15, 2020 . 7 मिनट में पढ़ें