एनवायरमेंटल डिजीज क्या हैं और यह लोगों को कैसे प्रभावित करती हैं?
कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भारत में यह कहावत काफी प्रचलित है। यहां कदम-कदम पर अलग-अलग भाषाएं बोलीं जाती है वहीं लोगों के पहनावे के साथ संस्कृति यहां तक की जलवायु में भी बदलाव दिखता है। ऐसे में पर्यावरण बदलाव होने पर उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक के लोगों को सावधान होने की जरूरत होती है। वहीं समुद्री इलाकों के साथ पहाड़ी, समतल इलाकों में जहां मौसम सामान्य की तुलना में अलग होता है वहां के लोगों को बदलते मौसम में एनवायरमेंटल डिजीज होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। एनवायरमेंटल डिजीज को लेकर क्या सावधानी बरतनी चाहिए आइए जानते हैं इस आर्टिकल में।
क्या है एनवायरमेंट डिजीज, लोगों को किस प्रकार करती हैं प्रभावित?
वातावरण के कारण कई बीमारियां हो सकती हैं। जमशेदपुर में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में बीते 25 वर्षों से सेवा दे रहे मेडिकल ऑफिसर एमबीबीएस डॉ. उदय कुमार सिंहा बताते हैं कि,’एनवायरमेंटल डिजीज में कई प्रकार की बीमारियां आती हैं। वायरल के कारण होने वाली बीमारी, किसी संक्रमित व्यक्ति के छूने और खांसने के कारण या फिर उसके संपर्क में आने से, वातावरण के कारण, एनवायरमेंट में बदलाव होने से बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से भी बीमारी हो सकती है। ये सभी एनवायमेंटल डिजीज में आती हैं। ऐसे में जरूरी है कि एनवायरमेंटल डिजीज से बचाव को लेकर सतर्क रहा जाए।’
भारत में सामान्य तौर पर गर्मी, सर्दी, बरसात का मौसम अहम है। डॉ. उदय कुमार सिन्हा के अनुसार वातावरण के कारण बीमारियां व एनवायरमेंटल डिजीज में ऐसी बीमारियां आती हैं जो मौसम के बदलने पर होती है। ऐसेमें जरूरी है कि जब भी मौसम परिवर्तन हो तो सतर्क हो जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि बदलते मौसम के दौरान वायरस-बैक्टीरिया सामान्य रूप से ज्यादा एक्टिव होते हैं। इसके कारण लोगों के संक्रमित होने की संभावना भी बढ़ जाती है। इन्हें हम मौसमी बीमारी भी कहते हैं।
Dr. Uday Kumar Sinha
गर्मी में होने वालीं एनवायरमेंटल डिजीज
डॉ. सिन्हा बताते हैं कि गर्मी के मौसम में होने वाली एनवायरमेंटल डिजीज में सामान्य तौर पर स्किन संबंधी बीमारी घमौरी, लू या हीट स्ट्रोक लगना, डिहाइड्रेशन व लूज मोशन, डायरिया व डिसेंट्री जैसी समस्या हो सकती है। ऐसे में जरूरी है कि वातावरण के कारण होने वाली बीमारियों से बचने के लिए इन प्रकार की बीमारी से बचें। वहीं बीमारी के लक्षण दिखते ही डाॅक्टरी सलाह ली जाए।
एनवायरमेंटल डिजीज में घमौरी का नाम सबसे पहले आता है। जनरल फिजिशियन डॉ उदय बताते हैं कि यह बीमारी वैसे तो किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है, लेकिन ज्यादातर बच्चों में पांच से लेकर 15 की उम्र के बच्चों में देखने को मिलती है। बीमारी होने के कारणों का अब तक साफ साफ पता नहीं चल पाया जा, लेकिन माना जाता है कि यह बीमारी शरीर में डिहाइड्रेशन के कारण होती है। यानि शरीर में पानी की कमी होने से यह बीमारी हो सकती है।
इस बीमारी में शरीर की स्किन रफ हो जाती है, बदन में छोटी-छोटी फुंसियां हो जाती हैं, खासतौर पर पीठ और दोनों बांह के पीछे, नाखून के छोर से कुछ निकलता है, टेढ़े मेढ़े नाखून हो सकते हैं। डिस्कंफर्ट होने के साथ जलन, खुजली होती है। शरीर में ऐसे लक्षण दिखने पर मरीज के खास तरह का पाउडर लगाने की सलाह दी जाती है, जिससे स्किन नम रहे। इसके अलावा मरीज को बार-बार नहाने और पानी की नियमित मात्रा का सेवन करने की सलाह दी जाती है। वहीं व्यस्कों को यदि यह बीमारी हो तो उन्हें पाउडर के इस्तेमाल की सलाह के साथ एंटीबायोटिक देकर इलाज किया जाता है। जरूरी है कि इस बीमारी से बचाव के लिए लक्षण दिखने पर डॉक्टरी सलाह ली जाए।
गर्मी के दिनों में लू की समस्या काफी सामान्य और गंभीर भी है। एनवायरमेंटल डिजीज में आने वाली इस बीमारी के बारे में मेडिकल ऑफिसर डॉ. उदय सिन्हा बताते हैं कि लोग यदि गर्मी के दिनों में खास एहतियात न बरतें तो उन्हें यह बीमारी हो सकती है। घर से निकलते वक्त मुंह, नाक, कान न ढ़कें, नियमित पानी का सेवन न करें तो इस बीमारी का शिकार हो सकते हैं। शरीर में इलेक्ट्रोलाइन का बैलेंस गड़बड़ाने के कारण यह बीमारी होती है।
लू लगने से ज्यादा पसीना निकलता है। वहीं दिल की धड़कन को सामान्य रूप से धड़कने के लिए सोडियम व पोटेशियम का अहम रोल होता है, ज्यादा पसीना निकलने के कारण शरीर में सोडियम की कमी हो जाती है वहीं इसके इंबैलेंस के कारण हीट स्ट्रोक की समस्या हो सकती है। ऐसे में मरीज को अचानक बेहोशी, हार्ट अटैक, लूज मोशन, डिहाइड्रेशन, तेज बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, कमजोरी, भूख न लगना और खाना पचाने में दिक्कत आ सकती है। शरीर में इस प्रकार के लक्षण दिखे तो डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए।
इस एनवायरमेंटल डिजीज से बचाव के लिए जरूरी है कि धूप से बचाव किया जाए। घर से निकलते वक्त मुंह में कपड़ा बांधकर निकला जाए, पानी पीते रहें ताकि शरीर में पानी की कमी न हो, नमक, चीनी और पानी का घोल पीने के साथ सत्तू पानी पीना फायदेमंद होता है। इस बीमारी को हल्के में न लें, यदि सही समय पर इसका इलाज न कराया गया तो जान तक जा सकती है। यह बीमारी किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है, जो गर्मी में घर से बाहर निकलते हैं।
डॉ. उदय के अनुसार एनवायरमेंटल डिजीज में बरसात के मौसम में डायरिया-डिसेंट्री, कफिंग-स्नीजिंग और बुखार की समस्या हो सकती है। डायरिया की बीमारी होने से मरीज को काफी लूज मोशन होते हैं, मुंह काफी सूख जाता है (dryness of mouth), तेज बुखार, पेट का स्किन लूज होना (जब दबाते और स्किन को अपने सामान्य पोजिशन में आने समय समय लगता है तो इसकी पहचान होती है) यह बीमारी के लक्षणों में से एक है। बीमारी बढ़ जाए तो बैक्टीरियल इंफेक्शन भी हो सकता है, खाना पचाने में दिक्कत के साथ शरीर में जो खाना नहीं पचता वो बाहर आ जाता है। इसके कारण शरीर में मिनरल्स और विटामिंस की कमी आ जाती है। बीमारी को हल्के में न लेकर डॉक्टरी इलाज कराना चाहिए। वहीं यह बीमारी ज्यादातर युवाओं में देखने को मिलती है, यदि महामारी के तौर पर यह फैल जाए तो इसे कोलेरा भी कहा जाता है। मौजूदा समय में इसका टीका उपलब्ध है।
डॉ उदय बताते हैं कि कफिंग स्नीजिंग की बीमारी एनवायरमेंटल डिजीज की श्रेणी में आती है। बीमारी के होने से सोर थ्रोट यानि गले में भारीपन, कफिंग-स्नीजिंग व बुखार भी हो सकता है। सामान्य तौर पर यह बीमारी 4-5 दिनों में पूरी तरह ठीक हो जाती है। वहीं शरीर में ऐसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए। बच्चों में इस बीमारी पर सही समय पर इलाज न किया गया तो यह आगे चलकर ब्रोंकाइटिस में तब्दील हो जाती है। ज्यादातर यह बीमारी 12 से लेकर 20 साल की उम्र के लोगों को होती है। बीमारी होने पर बड़ी वजह यदि कोई व्यक्ति तुरंत बाहर से आकर ठंडा पानी पी लेता है तो उसके कारण भी उसमें इस प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैं।
एनवायरमेंटल डिजीज में बरसात के दिनों में फंगल इंफेक्शन की बीमारी से काफी सावधान रहना चाहिए। इस बीमारी के लक्षणों में नाखून में बदलाव देखने को मिलते हैं, उसकी असामान्य ग्रोथ होती है, शेप अलग दिखता है, नाखून की ऊपरी सतह का रंग बदला होता है, वहीं पिंकनेस काफी कम दिखती है। कई बार हमारे प्राइवेट पार्ट में भी फंगल इंफेक्शन हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बरसात के दिनों में कपड़े ठीक से सूखते नहीं। इस वजह से उनमें नमी हो जाती है। ऐसे में प्राइवेट पार्ट के पास खुजली होती है, महिलाओं में व्हाइट डिस्चार्ज की समस्या भी हो सकती है। यह सामान्य तौर पर उन महिलाओं में देखने को मिलता है जो बाथरूम में न नहाकर तालाब, पोखर, नदी आदि में नहाती हैं। शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों की महिला में यह ज्यादा देखने को मिलता है। ऐसे इस बीमारी का इलाज एंटी फंगल क्रीम देकर किया जाता है। शरीर में यदि इस तरह के बदलाव दिखे तो डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए।
एनवायरमेंटल डिजीज में सर्दी भी आती है। यदि इसका इलाज न किया गया तो हमारे लंग्स को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में लंग्स के पास स्टोन जैसा महसूस होता है। जब डॉक्टर उंगलियों से टेस्ट करते हैं तो लंग्स के ऊपर से ठक-ठक जैसी आवाज आती है, यदि आवाज आए तो स्थिति काफी गंभीर होती है। इस कारण लंग्स में ऑक्सीजन और कार्बनडाइऑक्साइड का बैलेंस भी गड़बड़ा जाता है। लंग्स शरीर में अच्छे से ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं कर पाते और सांस लेने में परेशानी होने के साथ ब्लड में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। सामान्य भाषा में इसे उल्टा सांस चलना भी कहा जाता है।
एनवायरमेंटल डिजीज में एलर्जी व बैक्टीरियल इंफेक्शन का खतरा
मौसम में बदलाव के कारण एलर्जी और बैक्टीरियल इंफेक्शन जैसी मौसमी बीमारी हो सकती है। इसके कारण रेस्पीरेटरी प्रॉब्लम, स्किन प्रॉब्लम और नर्वस सिस्टम में परेशानी हो सकती है। रेस्पीरेटरी प्रॉब्लम के कारण एलर्जिक ब्रोंकाइटिस की बीमारी हो सकती है। इसके होने से तेज सांस चलना, तेज बुखार के साथ गले में कफ जैसा महसूस होता है। सामान्य तौर पर यह बीमारी सात साल से लेकर 15 साल तक के बच्चों को हो सकती है। कई बार मरीज को ऑक्सीजन चढ़ाने के साथ इनहेलर की सलाह दी जाती है। ताकि उसे तुरंत रिलीफ मिले।
वहीं भारत में अलग अलग जगहों पर मौसम में परिवर्तन के कारण अलग अलग लक्षण देखने को मिल सकते हैं। जैसे हिमाचल में एलर्जी होने की वजह से स्किन में रेड पैचेस, बुखार हो सकता है। वहीं गुजरात जैसे जगहों पर शरीर में दाने, रफ स्किन होने के साथ स्किन में व्हाइट सोर्स की समस्या दिख सकती है। वहीं समुद्री इलाकों व आसपास के इलाकों के लोगों में स्किन का रंग बदलने के साथ स्ट्रेचिंग जैसा महसूस हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि एनवायरमेंटल डिजीज से बचाव के लिए बीमारी का लक्षण देख डाॅक्टरी सलाह लेनी चाहिए।
हो सकता है सीजनल एफेक्टिव डिसऑर्डर (एसएडी)
सीजनल एफेक्टिव डिसऑर्डर की समस्या डिप्रेशन से संबंधी परेशानी है जो अक्सर मौसम के परिवर्तन के दौरान देखने को मिलती है। आपके देखते भी होंगे की कई लोग उस वक्त दुखी होते हैं जब सर्दियों का मौसम शुरू होता है या फिर तब जब गर्मियों के मौसम की शुरुआत होती है। इस बीमारी का इलाज लाइट थेरिपी या फिर दवाइयां देने के साथ साइकोथेरिपी के द्वारा किया जाता है।
अब तो आप समझ गए होंगे कि एनवायरमेंटल डिजीज क्या होती हैं और एनवायरमेंटल डिजीज से कैसे बचा जा सकता है। इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए डाॅक्टरी सलाह लें।
बीएमआई कैलक्युलेटर
डिस्क्लेमर
हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।
Almost a quarter of all disease caused by environmental exposure/ https://www.who.int/mediacentre/news/releases/2006/pr32/en/ Accessed 17th April 2020
Enviornmental disease from a to z/https://www.niehs.nih.gov/health/assets/docs_a_e/environmental_diseases_environmental_diseases_from_a_to_z_english_508.pdf Accessed 17 April 2020
Season and Disease/https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC2102326//Accessed 17th April 2020
Seasonal affective disorder (SAD)/ https://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/seasonal-affective-disorder/symptoms-causes/syc-20364651Accessed 17th April, 2020
Input from- Dr. Uday kumar sinha, BSC, MBBS, Medical Officer of State Bank Of India, Jamshedpur, From last 25 years Working with SBI.