home

हम इसे कैसे बेहतर बना सकते हैं?

close
chevron
इस आर्टिकल में गलत जानकारी दी हुई है.
chevron

हमें बताएं, क्या गलती थी.

wanring-icon
ध्यान रखें कि यदि ये आपके लिए असुविधाजनक है, तो आपको ये जानकारी देने की जरूरत नहीं। माय ओपिनियन पर क्लिक करें और वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखें।
chevron
इस आर्टिकल में जरूरी जानकारी नहीं है.
chevron

हमें बताएं, क्या उपलब्ध नहीं है.

wanring-icon
ध्यान रखें कि यदि ये आपके लिए असुविधाजनक है, तो आपको ये जानकारी देने की जरूरत नहीं। माय ओपिनियन पर क्लिक करें और वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखें।
chevron
हम्म्म... मेरा एक सवाल है
chevron

हम निजी हेल्थ सलाह, निदान और इलाज नहीं दे सकते, पर हम आपकी सलाह जरूर जानना चाहेंगे। कृपया बॉक्स में लिखें।

wanring-icon
यदि आप कोई मेडिकल एमरजेंसी से जूझ रहे हैं, तो तुरंत लोकल एमरजेंसी सर्विस को कॉल करें या पास के एमरजेंसी रूम और केयर सेंटर जाएं।

लिंक कॉपी करें

किशोरावस्था में सेहत का ध्यान रखना क्यों है जरूरी?

किशोरावस्था में सेहत का ध्यान रखना क्यों है जरूरी?

किशोरावस्था बचपन और जवानी के बीच का वह महत्वपूर्ण समय है जब बच्चों में कई हार्मोनल, भावनात्मक और शारीरिक बदलाव आते हैं। इसलिए यह समय बहुत अहम होता है जब पैरेंट्स को बच्चे पर बहुत अधिक ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इसी दौरान वह गलत राह पर जा सकते हैं और डिप्रेशन आदि का भी शिकार हो सकते हैं। 13 से 19 साल की एज ग्रुप को इसमें शामिल किया जाता है। किशोरावस्था में सेहत (Adolescence Health) का ध्यान रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि यही वह उम्र है जब किशोरों में अच्छे स्वास्थ्य की नींव डाली जा सकती है और वह एक स्वस्थ व्यस्क बन सकते हैं। किशोरावस्था में सेहत (Adolescence Health) का ध्यान रखने के लिए क्या किया जाना चाहिए, आइए जानते हैं।

किशोरावस्था में अच्छी सेहत क्यों महत्वपूर्ण हैं?

किशोरों में शारीरिक, कॉग्निटिव और साइकलॉजिकल विकास बहुत तेजी से होता है। जिसका असर उनकी महसूस करने की क्षमता, सोच, निर्णय क्षमता और पूरी दुनिया से परस्पर व्यवहार के तरीके पर पड़ता है। किशोरावस्था (Adolescence) को जीवन का सबसे स्वस्थ समय माना जाता है, बावजूद इसके इस अवस्था में बहुत मृत्यु, बीमारी और इंजरी होती है। इनमें से अधिकांश का उपचार या उनसे बचाव किया जा सकता है। किशोरावस्था में ही व्यवहार का पैटर्न निर्धारित किया जाता है- जैसे डायट संबंधी, फिजिकल एक्टिविटी, सब्सटैंस यूज और सेक्सुअल एक्टिविटी आदि। सही व्यवहार पैटर्न (Behavior pattern) निर्धारित करके किशोरों की सेहत के साथ ही उनके आसपास के लोगों की सेहत को भी सुरक्षित रखा जा सकता है और गलत पैटर्न उनके वर्तमान स्वास्थ्य के साथ ही भविष्य को भी जोखिम में डाल सकता है। सही विकास और अच्छी स्वास्थ्य आदतें (Healthy habits) विकसित करने के लिए किशोरों को सही जानकारी, उम्र के अनुसार सेक्स एजुकेशन (Sex education), लाइफ स्किल विकसित करने के मौके, प्रभावी और स्वीकार्य स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच होनी जरूरी है। इसके साथ ही उन्हें सपोर्टिव और सुरक्षित वातावरण भी मिलना चाहिए। किशोर अधिकांश देशों की आवादी का बहुत बड़ा हिस्सा है जो देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में अहम भूमिका निभाते हैं, क्योंकि यही देश का भविष्य है। ऐसे में एडोलसेंट हेल्थ या किशोरावस्था में सेहत (Adolescence Health) का ध्यान रखकर देश के भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है।

और पढ़ें- उम्र के अनुसार घटता-बढ़ता है टेस्टोस्टेरोन का लेवल, जानें इसके बारे में

किशोरावस्था में सेहत को प्रभावित करने वाले कारक (Factors that affect adolescence health)

Adolescence Health : किशोरावस्था में सेहत

इस बारे में डफरिन हॉस्पटिल के चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर सलमान का कहना है कि यह सही है कि बच्चों को नियम सिखाना बहुत जरूरी है, लेकिन हर बात में उनके लिए नियम हो, यह जरूरी नहीं है। बच्चे की संवेदनशीलता का ध्यान रखते समय इस बात का भी पेरेंट्स को ख्याल रखना जरूरी है कि बच्चों को पर उतने ही नियम लगाएं, जितना अनुशासन के लिए जरूरी है। इससे बच्चे को एक अच्छा माहौल मिलेगा। बात-बात में नियम लगाने से बच्चों का मानसिक विकास (Mental Health) भी प्रभावित होता है। हां, लेकिन जो नियम बच्चे के अनुशासन के लिए है, उन नियमों का पालन जरूर करवाइए। बच्चे के लिए कुछ नियमों का होना भी जरूरी है, नहीं तो बच्चा जिद्दगी हो जाएगा। संवेदनशील बच्चे बदलावों को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते। सेंसिटिव बच्चों की पेरेंटिंग टिप्स में पेरेंट्स को इन बातों का ध्यान रखना होगा।

टीनेज में बच्चों की सेहत खासतौर पर मानसिक सेहत कई कारकों से प्रभावित होती है जिसमें शामिल है-

जनरेशन गैप (Generation gap) – इस उम्र में बच्चों पर पीयर प्रेशर (Peer pressure) अधिक होता है और पैरेंट्स व उनकी सोच में बहुत अंतर होता है, जिससे कई बार वह डिप्रेशन (Depression) में चले जाते हैं।

भावनात्मक असंतुलन (Emotional Instability)- इस दौरान बच्चों में शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक बदलाव बहुत तेजी से होता है जिसका असर उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ना स्वाभाविक है।

पैरेंट्स का व्यवहार (Parents behaviour) – टीनेज बहुत ही नाजुक दौर होता है, इस दौरान बच्चों को प्यार और समझादारी से हैंडल करने की जरूरत है, क्योंकि कई बार पैरेंट्स का सख्त रवैया उन्हें तनाव (Stress) का शिकार बना देता है।

फिजिकल एक्टिविटी (Physical activity)- बचपन में सही शारीरिक और मानसिक विकास (Mental growth) के लिए फिजिकली एक्टिव होना जितना जरूरी होती है कोशोरावस्था में भी यह उतना ही जरूरी है।

समाजिकता (Socialisation)- किशोर किन लोगों के साथ उठता-बैठता है, उसके दोस्त कैसे हैं? आदि बातों का भी बच्चों की सेहत पर असर पड़ता है।

परिवारिक माहौल (Family environment)- यदि बच्चे के पैरेंट्स बहुत फिजिकली एक्टिव (Physically active) रहते हैं और हेल्दी लाइफस्टाइल को फॉलो करते हैं तो वह भी वही करेगा। यानी पारिवारिक माहौल भी बच्चों की सेहत में अहम भूमिका निभाता है।

किशोरावस्था की आम स्वास्थ्य समस्याएं (Adolescence common health conditions)

किशोरावस्था में सेहत (Adolescence Health) का ध्यान रखने के लिए पैरेंट्स को इस उम्र में होने वाली आम स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जानकारी होनी चाहिए जो किशोरों के शीरीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

हिंसा (Violence)

उस उम्र में किशोरों (Teenagers) के साथ होने वाले हिंसा उनकी मौत का एक बड़ा कारण है। जानकारों का मानना है कि ज्यादातर मेल एडोलसेंट (Male Adolescence) या किशोर को हिंसा का सामना अधिक करना पड़ता है, जबकि 20 साल तक की हर 10 में से एक लड़की सेक्सुअल एब्यूज का सामना करना पड़ता है जो कि बहुत ही गंभीर स्थिति है। किशोरों के साथ होने वाली हिंसा के लिए हार्मोनल (Hormonal) बदलावों को जिम्मेदार ठहराया जाता है, क्योंकि यह उन्हें आक्रामक बना देता है। यही आक्रामकता हिंसा को जन्म देती है, जो किशोरों की जिंदगी को प्रभावित करने के साथ ही शिक्षा और करियर पर भी असर डालती है और कई बार मौत का कारण भी बन जाती है। किशोरावस्था में हिंसा का शिकार होने पर इंजरी (Injury) का जोखिम बढ़ जाता है, इसके अलावा HIV और दूसरे सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन (Sexually transmitted infection) का खतरा भी।

और पढ़ें- जानिए क्या है ओपोजिशनल डिफाइएंट डिसऑर्डर और उसे कैसे हैंड्ल करें

मानसिक स्वास्थ्य (Mental health)

किशोरों में बीमारी और विकलांगता का एक बहुत बड़ा कारण डिप्रेशन है और 15-19 साल के बच्चों की मौत का एक बड़ा कारण आत्महत्या है जो डिप्रेशन का ही नतीजा होता है। व्यस्कों को होने वाली करीब आधी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं 14 साल की उम्र से ही शुरू हो जाती है, लेकिन अधिकांश में मामलों में इसका निदान और उपचार नहीं किया जाता है, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान ही नहीं दिया जाता है।

किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर कई चीजों का असर होता है जैसे हिंसा, गरीबी, स्टिग्मा, बहिष्कार आदि। इन सबकी वजह से बच्चे का मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह से प्रभावित होता है और यदि समस्या का उपचार न किया जाए तो व्यस्क होने पर यह और बढ़ जाती है और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य दोनों को इतनी बुरी तरह प्रभावित करती है कि वह व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं जी पाता।

एल्कोहल और ड्रग्स का इस्तेमाल (Alcohol and drug use)

किशोरावस्था में कभी पीयर प्रेशर तो कभी जिज्ञासावश बच्चे शराब और ड्रग्स का सेवन कर लेते हैं और अपना आपा खो बैठते हैं। शौकिया तौर पर शुरू किया गया यह सेवन कई बार लत में तब्दील हो जाता है। शराब और ड्रग्स के नशे में उन्हें पता ही नहीं चलता कि वह क्या कर रहे हैं औ कई बार असुरक्षित यौन संबंध बना लेते हैं, खतरनाक रूप से गाड़ी चलाकर अपनी और दूसरों की जान जोखिम में डाल देते हैं। शराब की लत यदि जल्दी न छुड़ाई जाए तो व्यस्क होने पर भी यह आदत बनी रहती है जिसका उनकी जिंदगी और सेहत पर गहरा असर पड़ता है। एल्कोहल (Alcohol) और ड्रग्स (Drugs) का इस्तेमाल बच्चों और किशोरों में न्यूरोकॉग्निटिव अल्टरेशन (neurocognitive alterations) से संबंधित है, जो आगे चलकर बिहेवरियल, इमोशनल और एकेडमिक समस्याएं खड़ी कर सकता है।

एचआईवी/एड्स (HIV/AIDS)

डब्लूएचओ के 2019 के एक आकड़े के मुताबिक, करीब 1.7 मिलियन किशोर (10-19) एचआईवी के साथ जी रहे हैं। सेक्स एजुकेशन (Sex education) की कमी और सेक्स को लेकर जिज्ञासा, असुरक्षित यौन संबंध बनाने के कारण किशोर एचआईवी (HIV) का शिकार हो जाते हैं और बहुत से मामलों में उपचार भी नहीं करवाते जिससे स्थिति और खराब हो जाती है। ऐसे में किशोरों को साइकोलॉजिकल और पैरेंट्स से सपोर्ट की जरूरत है। उन्हें सही सेक्स एजुकेशन देकर और सुरक्षित सेक्स (Safe sex) के बारे में जानकारी देकर एचआईवी इंफेक्शन (HIV infection ) से बचाया जा सकता है।

अन्य संक्रामक बीमारी (Other infectious diseases)

चाइल्डहूड वैक्सीनेशन के कारण किशोरों में मिजल्स (Measles) और डायरिया जैसी बीमारियों का प्रभाव कम हो गया है। 2000 और 2012 में अफ्रीकन रीजन में मिजल्स से होने वाले किशोरों की मौत का आकड़ा 90 प्रतिशत तक कम हो गया। इसके अलावा डायरिया (Diarrhoea), लोअर रेस्पिरायट्री ट्रैक्ट इंफेक्शन (lower respiratory tract infections) (न्यूमोनिया) और मेनिन्जाइटिस (meningitis) जैसी बीमारियों का खतरा भी कम हुआ है। लेकिन ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (Human Papilloma Virus) का खतरा कम नहीं हुआ है, यह वायरस सेक्सुअल एक्टिविटी के दौरान फैलता है और यह सर्वाइकल और दूसरे कैंसर के लिए जिम्मेदार हो सकता है

पोषक तत्व और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी (Nutrition and micronutrient deficiencies)

आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया (Anemia) किशोरों को होने वाली मुख्य स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। ऐसे में आयरन (Iron) और फॉलिक एसिड सप्लीमेंट (Folic acid supplements) से इस समस्या को दूर किया जा सकता है, वरना व्यस्क होने पर कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो सकती है। इसके अलावा किशोरों में हेल्दी ईटिंग हैबिट (Healthy eating habits) डेवलप करके भी पोषक तत्वों (Nutrition) और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (Micro nutrients) की कमी को दूर किया जा सकता है। दरअसल, स्कूल-कॉलेज में जाने के बाद बच्चे जंक फूड आदि का अधिक सेवन करने लगते हैं जिसका उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि पैरेंट्स उन्हें घर पर आने के लिए प्रेरित करें और भोजन में सभी तरह के पोषक तत्वों को शामिल करें।

ईटिंग डिसऑर्डर (Eating Disorders)

किशोरावस्था में होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में ईटिंग डिसऑर्डर (Eating disorders) भी शामिल है। वैसे तो यह समस्या व्यस्कों में भी देखी गई है, लेकिन इसकी शुरुआत किशोरावस्था से ही होती है। अक्सर लोग इसे लाइफस्टाइल चॉइस समझने की भूल कर बैठते हैं, जबकि ईटिंग डिसऑर्डर एनोरेक्सिया नर्वोसा (anorexia nervosa) और बुलिमिया नर्वोसा (bulimia nervosa) जैसे गंभीर बीमारी के कारण होता है। ईटिंग डिसऑर्डर लड़के और लड़कियों किसी को भी प्रभावित कर सकता है, लेकिन इससे प्रभावित लड़कियों की संख्या अधिक देखी गई है। यदि आपका बच्चा हमेशा कुछ न कुछ खाता रहता है और उसका वजन भी बढ़ रहा है, तो यह ईटिंग डिसऑर्डर (Eating disorder) के कारण हो सकता है।

और पढ़ें- बच्चों के विकास का बाधा बन सकता है चाइल्ड लेबर, जानें कैसे

मोटापा (Obesity)

टीनेज में गलत खानपान की आदतें और फिजिकल एक्टिविटी कम होने से अक्सर बच्चे मोटापे का शिकार हो जाते हैं जिससे उनमें टाइप 2 डायबिटीज (Type 2 diabetes) और दिल की बीमारियों (Heart disease) का खतरा बढ़ा देती है। इसके अलावा अस्थमा (Asthma) और फैटी लिवर डिसीज (Fatty liver disease), एग्जाइटी (Anxiety), डिप्रेशन (Depression), आत्मविश्वास कम होने की भी समस्या हो सकती है। इस उम्र में मोटापे का शिकार होने पर व्यक्ति व्यस्क होने पर भी इसका शिकार रहता है। इससे बचने के लिए किशोरों को हेल्दी डायट (Healthy diet), एक्सरसाइज रूटीन फॉलो करने के साथ ही नींद भी पूरी करने की जरूरत है।

किशोरों के लिए बीमारियों से बचाव के तरीके और जीवनशैली में बदलाव (Preventive measures and lifestyle modifications)

Adolescence Health : किशोरावस्था में सेहत

किशोरावस्था में यौन रोग और मानसिक स्वास्थ्य (Mental health) का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। उन्हें एचआईवी (HIV) जैसे यौन रोगों से बचाने के लिए सही यौन शिक्षा (Sex Education) देने के साथ पैरेंट्स का बच्चों से खुलकर बात करना भी जरूरी है ताकि वह गलत राह पर न जाए। एल्कोहल और ड्रग्स के सेवन (Drugs use) से बचाने के लिए जरूरी है कि पैरेंट्स बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखें और वह किन लोगों की संगत में रहते हैं, क्या करते हैं जैसी बातों की जानकारी रखें। इसके लिए जरूरी है कि वह बच्चे के साथ मजबूत बॉन्डिंग बनाए ताकि वह उनसे हर बात शेयर कर सके।

सेक्सुअल एब्यूज (Sexual abuse) से बचाने के लिए उन्हें छोटी उम्र से ही इस बारे में जानकारी देना और उनका विश्वास जीतना जरूरी है ताकि कभी कुछ गलत होने पर वह आपसे अपने मन की बात कह सकें। क्योंकि जब वह आपको बताएंगे तभी आप उनकी काउंसलिंग आदि करवाकर उन्हें डिप्रेशन (depression) मे जाने से बचा सकती हैं। बच्चों की मेंटल हेल्थ का ध्यान रखने के लिए जरूर है कि आप उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाएं। एग्जाइटी, तनाव, डिप्रेशन लक्षण दिखने पर उसे नजरअंदाज न करें, बल्कि तुरंत बच्चे का उपचार करवाएं। किशोरों को अच्छा माहौल और सपोर्ट मिलने पर वह किसी भी तरह की मानसिक बीमारी से उबर सकते हैं।

और पढ़ें- कम उम्र में पीरियड्स होने पर ऐसे करें बेटी की मदद

जीनवशैली में बदलाव है जरूरी

  • किशोरावस्था ही वह समय है जब अच्छे स्वास्थ्य की नींव रखी जा सकती है, इसलिए आप ध्यान रखें कि आपका बेटा/बेटी हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं।
  • टीनेज में हेल्दी डायट (Healthy diet) दें और खाना हमेशा समय पर खाने के लिए कहें, क्योंकि समय पर न खाने से भी मोटापा (Obesity) बढ़ सकता है।
  • इस उम्र में पढ़ाई का बहुत अधिक प्रेशर रहने के कारण वह बाहर नहीं खेल पाते यानी उनकी फिजिकल एक्टिविटी बहुत कम हो जाती है। ऐसे में आप बच्चे को एक्सरसाइज, साइकलिंग (cycling), रनिंग, स्वीमिंग (Swimming) और योग आदि के लिए प्रेरित करें, क्योंकि स्वस्थ रहने के लिए फिजिकली एक्टिव होना जरूरी है।
  • मन को शांत रखकर तनाव और डिप्रेशन से बचा जा सकता है, इसलिए बच्चे को मेडिटेशन (Meditaion) के लिए प्रेरित करें। हो सके तो मेडिटेशन क्लास जॉइन करवा दें।
  • नींद की भी बहुत अहमियत होती है। इस उम्र में बच्चे देर रात तक सोशल मीडिया या दोस्तों से चैट करने में बिजी रहते हैं, जिससे नींद पूरी नहीं होती है। पैंरेंट्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चा कम से कम 7-8 घंटे की नींद पूरी कर रहा है।

किशोरावस्था बहुत ही अहम और संवेदनशील समय होता है, इस दौरान हार्मोनल, शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक बदलाव बच्चे को कभी बेचैन तो कभी चिंतित कर देते हैं और उनकी सेहत भी प्रभावित होने लगती है। किशोरावस्था में सेहत (Adolescent health) का ख्याल रखने के लिए पैरेंट्स को हमेशा अपने बच्चों का सपोर्ट करना होगा और उन्हें समझना होगा।

health-tool-icon

बीएमआई कैलक्युलेटर

अपने बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) की जांच करने के लिए इस कैलक्युलेटर का उपयोग करें और पता करें कि क्या आपका वजन हेल्दी है। आप इस उपकरण का उपयोग अपने बच्चे के बीएमआई की जांच के लिए भी कर सकते हैं।

पुरुष

महिला

हैलो हेल्थ ग्रुप हेल्थ सलाह, निदान और इलाज इत्यादि सेवाएं नहीं देता।

लेखक की तस्वीर badge
Toshini Rathod द्वारा लिखित आखिरी अपडेट कुछ घंटे पहले को
डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यूड
x