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ऑस्टियोइंटिग्रेशन: क्या आप जानते हैं इसके बारे में?

ऑस्टियोइंटिग्रेशन: क्या आप जानते हैं इसके बारे में?

बिना हाथपैर वाले व्यक्ति या दिव्यांग जनों के लिए ऑस्टियोइंटिग्रेशन किसी वरदान से कम नहीं है। इस विषय में सबसे पहली खोज 1950 में प्रोफेसर इन्वार ब्रैंमार्क द्वारा की गई थी। यह हड्डियों को मेटल सरफेस से जोड़ने का एक ऐसा तरीका है, जिसमें शरीर में कृत्रिम अंग को असली अंगर की तरह फिट कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में एक धातु (टाइटेनियम) ट्रांसप्लांट करके हाथ या पैर की हड्डी में डाला जाता है और यह ट्रांसप्लांट त्वचा के माध्यम से आतंरिक शरीर का हिस्सा बनता जाता है।

ऑस्टियोइंटिग्रेशन की जरुरत क्यों होती है?

इसका फायदा ज्यादातर अंग विच्छेदन (जिनका अंग शरीर से अलग हो गया है) या जन्म से बिना हाथ–पैर के पैदा होने वाले रोगियों को होता है। ऑसियोइंटिग्रेटेड प्रोस्थेसिस शरीर के उस अंग को स्थिरता देता है और यह बेहतर चलने में मदद करता है। ऑस्टियोइंटिग्रेशन का असर किसी भी शरीर की बाकि त्वचा पर नहीं होता है। क्योंकि कृत्रिम अंग सीधे हड्डी में जुड़ा हुआ है। इसलिए मरीजों को यह अपने शरीर के हिस्से के रूप में नेच्यूरल एस्पिरशन द्वारा महसूस किया जाता है। यह बेहद नई तकनीक है जो ऐसे लोगों की जीवन को बेहतर बनाने में योगदान देती है।

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ऑस्टियोइंटिग्रेशन के फायदे क्या हैं?

इसके निम्नलिखित फायदे हो सकते हैं। जैसे-

• प्रोस्थेटिक उपयोग में वृद्धि,
• ज्यादा चल सकते हैं,
• शरीर की हलचल आराम से कर सकते हैं,
त्वचा की कोई समस्या नहीं है,
• स्थिर, सुरक्षित खड़े होकर चल सकते हैं,
• जीवन को पहले से बेहतर बनाता है।

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दो तरह की ऑस्टियोइंटिग्रेशन सिस्टम होते हैं:

• स्क्रू शेप प्रोस्थेसिस (ओपीआरए): यह प्रोस्थेसिस स्वीडन में ऑस्टियोइंटिग्रेशन पायनियर्स द्वारा विकसित किया गया था। टाइटेनियम से बना कृत्रिम अंग जो लगाया जाता है जिसमे स्क्रू की डिजाइन और कम लंबाई होती है। हालांकि टाइटेनियम स्क्रू को सॉलिड ऑस्टियोइंटिग्रेशन के लिए ज्यादा समय की आवश्यकता होती है और इसलिए जब तक वह पूरा वजन का भार नहीं लेता तब तक आप पूर्ववत नहीं हो सकते हैं, जिसका समय आमतौर 6 से 12 महीने हो सकता है। एक और नुकसान यह है कि इम्प्लांट ढीला हो सकता है और डिस्टल एबूटमेंट कमजोर हो सकती है। दैनिक गतिविधियों के दौरान ज्यादा ताकद की गतिविधियों के बाद एबटमेंट झुक या टूट सकता है।

• प्रेस फिट प्रोस्थेसिस (ILP): डिजाइन और ट्रांसप्लांट की तकनीक आर्थोपेडिक हिप प्रोस्थेसिस से ली गई थी। यह कृत्रिम अंग जर्मनी में विकसित किया गया था। इस प्रोस्थेसिस की ऑस्टियोइंटिग्रेशन क्षमता बहुत बड़ी होती है, इसलिए ओपीआरए सिस्टम की तुलना में प्रोस्थेसिस को बहुत पहले ही लोड किया जाता है। ऑस्टियोइंटिग्रेशन की अवधि 6 सप्ताह है और वहां वहां मौजूद सर्जन, सर्जरी के पहले स्टेज के बाद उसपर भर देने की अनुमति देते हैं। नई पीढ़ी के कृत्रिम अंग किसी न किसी सतह के साथ टाइटेनियम मिश्र धातु की से बने होते हैं। इस टाइटेनियम कृत्रिम अंग में आज-कल आर्थोपेडिक ट्रांसप्लांट के समान विशेषताएं हैं। ऑस्टियोइंटिग्रेशन जल्दी हो जाता है और आपके रिकवरी की अवधि भी कम होती है।

क्या ऑस्यिोइंटिग्रेशन के कोई नुकसान हैं?

ऑस्टियोइंटिग्रेशन एक सुरक्षित उपचार है। इसमें हड्डी में सूजन आने की संभावना कम ही होती है। एक नुकसान यह है कि जिस क्षेत्र में ट्रांसप्लांट होता है वह हिस्सा पानी और साबुन से दिन में दो बार साफ करने की आवश्यकता होती है। कुछ मामलों में वह हिस्सा त्वचा में जलन हो सकती है। सर्जरी के बाद पहले वर्ष में आपको मांसपेशियों में दर्द हो सकता है। यह मांसपेशियों का दर्द गायब हो जाता है जैसे ही आपके स्टंप की मांसपेशियां फिट और मजबूत हो जाती हैं।

डॉक्टर पुष्पेंद्र बजाज, ओर्थोपैडिशन (प्राइवेट क्लिनिक), कहते हैं, “ऑस्टियोइंटिग्रेशन एक किसी कारण शरीर के किसी एक अंग अलग होने वाले व्यक्तियों के लिए नैदानिक उपचार विकल्प बन गया है। ऑस्यिोइंटिग्रेशन उचित रूप से चुनाव करने पर बाधित व्यक्ति के जीवन में सुधार लाता है और लाभ प्रदान करता है, जो डाक्यूमेंट्स पर लिखें जोखिमों को स्वीकार करते हैं।”

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एक ऑस्टियोइंटिग्रेशन में हड्डी क्या होता है?

अधिकांश रोगियों का ऑस्टियोइंटिग्रेशन इलाज किया जाता है क्योंकि अस्थि-भंग ऑस्टियोपोरोसिस के कारण हड्डी कमजोर होती है। सॉकेट कृत्रिम अंग में हड्डी लोड नहीं होती है और स्टंप की मांसपेशियां भी सक्रिय नहीं होती हैं। इस कारण मांसपेशियों की मात्रा में कमी और हड्डी में कमजोरी हो सकती है। ऑस्टियोइंटिग्रेशन करने से नैच्युरल भार संभालने में मदद होती है और हड्डी को स्थिर करने के लिए स्टंप की मांसपेशियों को सक्रियता मिल जाती है। ऑस्टियोइंटिग्रेशन इम्प्लांट के आसपास की हड्डी मोटी और मजबूत हो जाती है।

ऑस्टियोइंटिग्रेशन दांतों के लिए भी किया जाता है। लेकिन, इससे जुड़े कुछ धारणाएं भी हैं जैसे-

मिथ: डेंटल इम्प्लांट नई टेक्नोलॉजी है जो प्रमाणित नहीं है।

फैक्ट: यह मान्यता गलत है। दरअसल दांतों के लिए ऑस्टियोइंटिग्रेशन साल 1952 से की जा रही है। यह प्रक्रिया कई सारे लोगों के लिए वरदान की तरह है। डॉक्टर्स और रिसर्च के अनुसार 95 प्रतिशत तक यह टेक्नोलॉजी सफल होती है और लोगों को इसका फायदा भी मिलता है। भारत में भी इस एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की मदद ली जा रही है और लोगों को इससे फायदा भी मिल रहा है।

मिथ: डेंटल इम्प्लांट करवाने में काफी वक्त लगता है और यह एक तरह से लॉन्ग प्रोसेस है।

फैक्ट: दरअसल डेंटल इम्प्लांट करवाने से पहले इससे जुड़े एक्सपर्ट से बात करें। प्रमाणित डेंटल एक्सपर्ट से ही डेंटल इम्प्लांट करवाएं। सही डॉक्टर के चयन से यह प्रोसेस आसान हो सकता है और जल्दी भी हो सकता है।

मिथ: उम्र ज्यादा होने की वजह से डेंटल इम्प्लांट करवाना मुश्किल पैदा कर सकता है।

फैक्ट: डेंटल इम्प्लांट करवाना है या नहीं यह निर्णय आप खुद से नहीं कर सकते हैं। डेंटल एक्सपर्ट ही इसकी सही सलाह आपको दे सकते हैं। डेंटल एक्सपर्ट डायबिटीज पेशेंट, कैंसर पेशेंट, हार्ट पेशेंट के साथ-साथ अन्य शारीरिक परेशानी होने के बावजूद डेंटल इम्प्लांट करने में सफल रहते हैं। इसलिए आपकी उम्र ज्यादा हो या आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं, तो ऐसी स्थिति में आप डेंटिस्ट से सलाह लेकर अपने दांतों की परेशानी को दूर कर सकते हैं।

इसलिए कोई भी शारीरिक परेशानी होने पर खुद से निर्णय न लें और खुद से इलाज न करें। अगर आप ऑस्टियोइंटिग्रेशन से जुड़े किसी तरह के कोई सवाल का जवाब जानना चाहते हैं तो विशेषज्ञों से समझना बेहतर होगा। हैलो हेल्थ ग्रुप किसी भी तरह की मेडिकल एडवाइस, इलाज और जांच की सलाह नहीं देता है।

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सूत्र

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लेखक की तस्वीर
Shilpa Khopade द्वारा लिखित आखिरी अपडेट 21/01/2020 को
Dr Sharayu Maknikar के द्वारा एक्स्पर्टली रिव्यूड
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